all stories are registered under Film Writers Association, Mumbai ,India. Please do not copy . thanks सारी कहानियाँ Film Writers Association, Mumbai ,India में रजिस्टर्ड है ,कृपया कॉपी न करे. धन्यवाद. Please do not theft , कृपया चोरी न करे. legal action can be taken .कानूनी कारवाई की जाएँगी .

Wednesday, March 25, 2015

प्रेमकथा - मैं तुम और प्रेम .............!!!

कोलाज़




::: प्रेमकथा - मैं, तुम और प्रेम :::

विजय कुमार सप्पत्ति

  
:: Address  : 
VIJAY KUMAR SAPPATTI ,  
FLAT NO.402, FIFTH FLOOR, PRAMILA RESIDENCY;
HOUSE NO. 36-110/402, DEFENCE COLONY,
SAINIKPURI POST,  SECUNDERABAD- 500 094 [TELANGANA]






::: प्रेमकथा - मैं, तुम और प्रेम  :::


खुदा से बड़ा रंगरेज कोई दूसरा नहीं है वो किसे क्या देता है, क्यों देता है, कब देता है, ये उसके सिवा कोई न जाने.ये सब सिर्फ और सिर्फ वो रब ही जाने. मोहब्बत भी एक ऐसी ही नेमत है खुदा की. हमारी मोहब्बत भी उसी नेमत का एक नाम हैऔर हाँ न; एक और नाम है उस नेमत का तुम !!!

:::::::::::: अंत :::::::::::

अक्सर जब मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि तुम नहीं हो...!
कही भी नहीं हो.
....बस तुम्हारा अहसास है......!
लेकिन क्या ये एक अंत है ?
मुझे तो यकीन नहीं है और तुम्हे ?

:::::::::::: मध्य :::::::::::

तुम मुझे देख रही थी.
और मैं तुम्हारे हाथो की उंगलियों को.
जाने क्या बात थी उनमे. मुझे लगता था कि तुम अपने हाथ को मेरे सीने से लगाकर कह दोगी कि तुम्हे मुझसे प्रेम है.

पर तुम कम कहती थी. मैं ज्यादा सुनने की चाह रखता था.
शब्द बहुत थे, लेकिन हम दोनों के लिए कम थे.

पहले मैं बहुत ज्यादा सोचता था और चाहता था कि तुम तक ये शब्द पहुँच जाए किसी तरह.
पर प्रेम और जीवन की राहे शायद अलग अलग होती है. शब्द अक्सर राहे बदल दिया करते थे. और मैं जीवन की प्रतीक्षा में जीवन को ही बहते देखता था.चुपचाप.

मैंने फिर लिख कर तुमसे अपने शब्दों की पहचान करवाई. तुम शब्दों कोमेरे शब्दों को जान जाती थी और समझ जाती थी कि मैं क्या कहना चाहता था. पर फिर भी तुम वो सब कुछ नहीं पढ़ पाती थीजो मैं अपने शब्दों में छुपा कर भेजता था! हमारा लिखना पढना बेकार ही साबित हुआ!

फिर मैंने कहना शुरू किया और तुमने सुनना. अब तुम मेरे शब्दों की कम्पन को पहचान जाती थी. लेकिन तुमने वही सुना जो मैंने कहा. तुम वो न सुन सकी जो मैं कह नहीं पाया!

और अब अंत में मैंने मौन को अपनाया है. तुम जानती तो होगी कि मौन के भी स्वर होते है. तुम सुन रही हो न मुझे मेरे मौन में ?

मैं ये भी चाहता था कि सत्य जानो तुम और शायद मुझे भी जानना ही था सत्य! पर मैं चाहता था कि तुम पहले जानो और समझो कि मैं प्रेम में हूँ. तुम्हारे प्रेम में !

लेकिन तुमने प्रेम को पढ़ा थासुना था और शायद जाना भी था पर समझा था कि नहीं ये मुझे नहीं पता था ; क्योंकि तुम मेरे प्रेम को पाकर असमंजस में थी. मैंने कोशिश की पर तुम जान न सकी.

क्योंकि तुम्हे प्रेम में होना पता न था! तुम सिर्फ प्रेम करना जानती थी. पर प्रेम में होना उसके बहुत आगे की घटना होती है और वही घटना मेरे साथ घट रही थी.

समय की गति और मन की गति के दरमियान प्रेम आ चूका था और अब एक बेवजह की जिद है कि प्रेम ज़िन्दगी को जीत ले.

प्रेम शिखर पर ही होता है
और हम इंसान उसके नीचे!
हमेशा ही!

उम्र के और समय के अपने फासले थे. मेरे और तुम्हारे दरमियान. तुम्हारे और मेरे दरमियान. हम दोनों और दुनिया के दरमियान. हम दोनोंदुनिया और ईश्वर के दरमियान!  सब कुछ कितना ठहरा हुआ था न. अब भी है. उम्र भी रुकी हुई ही है , समय भी ठहरा हुआ है और ज़िन्दगी भी रुकी हुई है !

याद है तुम्हेहम एक बहती नदी के बीच में खड़े थे. पानी की छोटी छोटी लहरे हम दोनों के पैरों के बीच में से निकल जाती थी. तुम पानी को देख रही थी. और मैं सोच रहा था कि काश एक जीवन ही बीत जाता ऐसे ही. और ये भी सही है कि उस ज़िन्दगी का उम्र से क्या रिश्ताजिन लम्हों में तुम मेरे साथ थी उसी में तुम्हे जी लिया. ज़िन्दगी को जी लिया. प्रेम को जी लिया. खुदा को जी लिया. सच में!

मुझे कभी तुम छु लेती. कभी तुम्हारा आसमान छु लेताकभी तुम्हारी धरती मुझे आगोश में ले लेती. कभी तुममे मौजूद नदी मुझे भिगो देती. कभी तुममे मौजूद समंदर ही मुझे डुबो लेता. कभी कभी तो सच में तुम ही मुझे छु लेती. तुम्हारी छुअन को अब तक सहेजे रखा है मैंने अपने मन की परतो में. सच्ची!

और तुम्हारी इसी छुअन की वजह से मुझे अब मेरे जिंदा होने का अहसास होता है.

इंतज़ार बहुत लम्बा है. समय की सीमा से परे. तुम्हारे पुकार की तमन्ना रहती है. एक अधूरी आस. तुम पुकार लेती तो मन कह लेता न कि हाँ नमैं हूँ. तुम हो और है हमारा प्रेम!

तुम्हे किसी से तो अपनी मन की कहनी थी भले वो तुम्हारी बेचैनी हो या फिर मन का तलाशपर कहनी तो थी मुझसे कह लीमुझे मेरा सकून तलाशना था बस इस तलाश की तलाश में कई और बाते भी जुड़ गयी और मैं तुम तक पहुँच गया. एक सफ़र यहाँ ख़त्म हो रहा था. या हो गया था और दूसरा शुरू होने वाला था या हो गया था. कौन जाने. खुदा जाने या तो तुम जानो. मैं भला क्या जानू.

खोज शुरू थी एक अनंत काल से. मैंने हर मुनसिब जगह ढूँढा तुम्हे. जहाँ देवता पूजे जाते थे वहां भी और वहां भी जहाँ धरती आकाश से मिलती थी. और वहां भी जहाँ अँधेरा उजाले से मिलता था. पता नहीं और भी कहाँ कहाँ! पता नहीं किस जन्म का नाता था तुमसे. तुम्हे सपनो में देखता था पहलेफिर अपनी नज्मो में. फिर मन में और फिर एक बहती नीली नदी के किनारे! तुम ही तो थी! सच !

जहाँ सब ख़त्म हो जाता हैवहां कुछ नए के शुरू होने की उम्मीद होती है. बस जहाँ रीते हुए जीवन की अंतिम बूँद बनीवही पर आकर तुम मिली. और एक कथा शुरू हुई. नयी. मेरी और तुम्हारी. हाँ!

मुझे लिखना अच्छा लगता है. और ख़ास कर तुम्हे लिखना. और जब मैं तुम्हे लिखता हूँ तो बस सिर्फ तुम ही तो होती हो. और दूसरा कोई हो भी नहीं सकता न. मैं तुममे मौजूद स्त्री के प्रेम में हूँ और जब मैं उस स्त्री के प्रेम मे होता हूँ जो कि तुम हो तो मेरी कोई और दुनिया नहीं होती है. और सच कहूँ तो हो भी नहीं सकती! और जब तुम, तुममे मौजूद स्त्री और उस स्त्री में मौजूद प्रेम जो कि शायद मेरे लिए ही मौजूद होते है तब मैं लिखता हूँ अक्षर, प्रेम, कविता , कथा और ज़िन्दगी!

प्रेम कठिन नहीं होताये तो सबसे सरल भाव है जिसे हमने अहोभाव के साथ स्वीकार करना चाहिए. पर हाँ जब हम उसे समाज के साथ जोड़ देते है तो फिर प्रेम कठिन हो जाता है तब वो प्रेम आत्मिक न होकर सामाजिक हो जाता है और फिर भला समाज ने कब प्रेम का साथ दिया है! हैं न. तो आओ सिर्फ प्रेम करे. कुछ और न सोचे और न ही जाने! बस प्रेम करे!

मुझे तुमसे तब प्रेम नहीं हुआजब मैंने तुम्हे देखा था. और तब भी नहीं,जब मैंने तुम्हे पहली बार छुआ था और तब तो बिलकुल भी नहीं जब मैं तुम्हारे साथ कुछ कदम साथ चला था. हाँ जब उस बहती नदी ने कहा कि तुम मेरी soul mate हो और जब वहां मौजूद पर्वतो ने कहा कि तुम मेरी soul mate हो और उस बहती नाव ने कहा था कि तुम मेरी soul mate हो और उन मेघो से भरे आकाश ने कहा कि तुम मेरी soul mate हो तब हाँ शायद तब मुझे प्रेम हुआ तुमसे. और फिर उसके बाद मुझे तुमसे प्रेम तब हुआजब तुमने मुझे देखा था. हाँ मुझे तुमसे प्रेम तब हुआ जब तुमने मुझे छुआ था और हाँ मुझे तुमसे प्रेम तब भी हुआ जब तुम कुछ कदम मेरे साथ चली थी. हाँ मुझे तुमसे प्रेम है.

नदी में तुम, रास्तो पर तुम, मंदिर में तुम ; धरती, जल और आकाश. हर जगह बस तुम. तुम से ही तो है न ये कायनात. प्रेम में जब इंसान होता है तो कुछ ऐसा ही तो लगता है. मुझे भी लगा. हाँ. मैं प्रेम में हूँ तुम्हारे प्रेम में................ सच्ची!

याद है तुम्हे वो सर्दियों के दिन थे और एक रात हमने भी जी साथ साथ. वो भी सर्द थी. हाँ तब एक बार ये चाह उठी कि तुम से वो तीन शब्द कहता जो कि सदियों से दोहराए जा रहे थे. और आश्चर्य कि वो अब भी उतने ही ताज़े महसूस होते है. प्रेम होता ही कुछ ऐसा है. उस सर्द रात में ऐसे कई लम्हे थेजब तुम मेरे मन तक पहुंची और मैंने उन्हें संजोकर रख दिया इस जन्म के लिए. उसी रात को पता नही ऐसा क्या बो दिया था तुमने मेरी आँखों में कि सपने उग आये है मेरे मन में. सच्ची. खैर वो तीन शब्द अब तक नहीं कहे जा चुके है. पता नहीं मेरी रूह की बारी कब आएँगी.

मैं चाहता था कि तुम्हे कुछ फूल दूंपर जिन रास्तो पर हम चलेउन पर फूल नहीं थे. उनपर ज़िन्दगी थी. ज़िन्दगीफूल और प्रेम ये तीनो ही अलग अलग दास्तानों की वजह है. ज़िन्दगी की अपनी राह होती है और प्रेम की अपनी. फूल ज़िन्दगी के लिए भी काम आते है और प्रेम के लिए. प्रेम में फूल अभिव्यक्ति बन जाते है - ज़िन्दगी के लिए. सो मैं जीना चाहता था / हूँ ; प्रेम के संग तुम्हारे साथ. भले ही वो कुछ लम्हे हो. पर देवताओ की साज़िश कुछ अलग होती है. उनकी बाते तो वही जाने. मैं अपनी कहता हूँ. तुम सुन सकती हो मुझे ? कहो तो!

समस्या वक़्त की है. मैं वक़्त के इन्तजार में हूँ. और एक दुआ भी साथ साथ करते रहता हूँ कि या तो वक़्त आ जाए या फिर तु ही आ जाए. वक़्त ही पहले आया. तुमने भी आना चाहा होंगा. पर वक़्त के आगे किसकी चली है और फिर जिन राहो पर चलकर तुम आना चाहती थी. वो शायद मुझ तक नहीं पहुँचती होंगी. या फिर जिस राह पर मैं चल था तुम तक पहुँचने के लिए शायद वो ही गलत थी. या फिर तुम मुझ तक पहुंचना ही नहीं चाहती...पर जो भी हो; कुछ ठहर गया है. हमेशा के लिए!

दिन पानी की तरह गुजर जाते है जैसे कोई बहती हुई नदी हो और रात यूँ बेअसर सी निकल जाती है जैसे ज़िन्दगी में एक ही रात आई होजो मैंने तुम्हारे संग जिया है. जीवन तो रेत की तरह फिसला है हाथो की लकीरों से. पर मैंने तुम्हारे प्रेम को अपनी ओक में लेकर अमृत की तरह पिया है इसलिए तो जीवित हूँ एक शब्द की गूँज की तरह! क्या जब तुम अकेली होती हो तो मेरे शब्दों की गूँज सुनाई देती है तुम्हे?

क्या किसी ने तुमसे पहले कहा है कि जब तुम खामोश रहती हो तो तब भी तुम कुछ कहती ही रहती हो. तुम्हारे अनकहे शब्द कुछ ज्यादा ही मुझ तक पहुँचते है. तुम जानती हो न कि मैं तुम्हारी ख़ामोशी को भी सुन लेता हूँ पर सवाल तुम्हारा है कि क्या तुमने मुझे पूरी तरह सुना ?

खैर मैंने यात्रा शुरू की है. ये यात्रा है मुझसे तुम तक और तुमसे मुझ तक और अंत में हम दोनों की प्रेम तक और प्रेम से अध्यात्म के अस्तित्व तक. देखते है क्या ये यात्रा हो भी पाती है या नहीं.क्योंकि जो चारवाह हमारी यात्रा करवा रहा है उसकी खुदाई हर बन्दे के लिए अलग ही होती है.

यात्रा पर हमारे साथ होंगे चन्द्रमातारे, बादल, सूरजनदीधरतीमेरा मैं और तुम्हारा तुम! इस यात्रा के साथ हमारे मन की भी यात्रा होंगी बाहर से भीतर की ओर और भीतर से बाहर की ओर.

दूसरी सारी यात्राये ख़त्म हो जायेंगी , बस हमारी ये यात्राये चलती रहेंगी. मैं तुमसे वादा करता हूँ कि मैं तुम्हारा इन्तजार करूँगा इस उम्र भर के लिए और उस यात्रा के लिए भी. हो सकता है कि हम रुक जाए पर मन चलते रहेंगे. और फिर एक दिन मन भी रुक जायेंगे.यात्रा अनंत है किसी मन की तरह .....और मन अशांत होता है. प्रेम शांत है. पर कहीं कुछ चुभता है. जीवन की फांस! हाँ!

शायर बशर नवाज़ साहब ने लिखा था करोंगे याद तो हर बात याद आएँगी. तुम्हे क्या क्या याद है. बताओ तो. मुझे तो सब कुछ याद हैतुम्हारा मुझे थामनामेरे लिए चिंतित होना और हाँशायद मन के किसी कोने में मेरे अहसास को घर देना. ये सब बस हुआ है. हो गया है. ठीक उसी तरह से जैसे दुनिया के सबसे बड़े डायरेक्टर ने कहा होंगा. अब तुम ये करो और हम कर बैठे. ऐसे देखो और हमने देखाऐसे छुओ और हमने छुआ. और उसने ये भी कहा था कि प्रेम करो. मैंने तो सुन लिया था. और तुमने ?

जो होता है सब पहली बार ही होता है. इस पहली बार में भले ही शब्द पुराने होपर धड़कन नयी होती है. उन शब्दों की ज़िन्दगी नयी होती है. उनकी उम्र भी नयी होती है. उनकी तासीर नयी होती है. उनके जज़्बात नए होते है. पता नहीं तुमने ये सब कुछ महसूस किया या नहीं. पर मैंने तो इन्हें जी लियाउन चंद शब्दों में जो तुमने मुझसे कहे.

तुम्हारा हँसना वो दूसरी बात थी जिसने मुझे तुरंत ही तुमसे जोड़ा. तुम्हारी हंसी में पता नही कितनी मुक्तता भरी हुई है. जीवन की मुक्तताउड़ने की मुक्तता. पता नहीं कितने आकाश चाहिए होंगे तुम्हे खुद को पंख देने के लिए. या यूँ भी समझ लोपता नहीं कितने पंख चाहिए होंगे तुम्हे इन आकाशो में उड़ने के लिए. तुम्हारे सपनो की उड़ानों में एक परवाज शायद मैं भी बन सकू. कौन जानता है. किसी की उड़ान को ! हाँ, कौन उड़ सकता है ये मुझे पता है. मैं और तुम.

प्रेम की संभावनाए अनंत है. जब हम किसी और लोक में होते है जो दुनियादारी से जुडी हुई होती है तो प्रेम की खुशबु मंद हो जाती है. हम इस कठोर और पागल समाज में अपने प्रेम को कैसे ढूंढें और कैसे बचाए रखे. पर जैसे कि मैंने कहा कि प्रेम की संभावनाए अनंत है. मैंने तो मेरा प्रेम तुममे ढूंढ लिया और संभव हो कि तुम्हारा प्रेम  भी मुझमे ही कहीं मौजूद हो. सवाल ढूँढने का है. तो ढूंढो! मैं अब भी तुम्हारी उस तलाश की प्रतीक्षा में हूँ जिसके द्वारा तुम मुझ तक पहुँचो.

मुझे लगता है कि तुम मौन में मुझसे कितना कुछ लेती हो. हाँये एक सवाल जरुर है कि मैं उस अनकहे  को किस तरह से decode करता हूँ. पर अगर हम प्रेम के एक वेवलेंथ पर है तो फिर सुनना क्यासमझना क्या और जानना क्या. पर बताओ तो भलाक्या तुम मुझे decode कर सकी हो.

तुमने कहा था कि तुम मुझे पुकारोगी. मैं इन्तजार करता रहा. एक एक पल में मैंने जैसे सदियों का सफ़र तय किया हो. दिन ढलते ढलते रात में तब्दील हो गया और रात गुजरते गुजरते फिर दुसरे दिन में बदल गयी  न तुमने पुकारा और न ही मैंने उम्मीद छोड़ी. मैं भूल सा जाता था कि तुम्हारे अपने भी बंधन होगेअपनी दुनिया होंगीजिसमे मेरी तो यकीनन कोई जगह नहीं होंगी. लेकिन मेरी प्रार्थना तुम्हारे दिल में पनाह पाने की थीन कि दुनिया में ;तुम्हारी दुनिया में. मेरी पनाह की ख्वाईश बहुत बड़ी न थीलेकिन उसके लिए दिल का बड़ा होना जरुरी था. सो तुम्हारे एक पुकार की चाह में मेरी पनाह की ख्वाईश छुपी हुई है . न तुमने पुकारा और न ही मैंने अब तक उम्मीद छोड़ी है. मुझे तुम्हारे साथ लम्हों में जो जीना है. प्रेम लम्हों में ही तो होता है.

मुझसे शुरू होते दिनो को मैं भेज देता था तुम्हे छूकर वापस आने के लिएपर किसी भी दिन ने मुझसे ये नहीं कहा कि वो तुम्हे छु पाया है. मैं इन्तजार करते रहतादिन आतेतुम तक मैं उन्हें भेजताऔर वो कभी भी वापस नहीं आते. हाँ राते आती जरुर एक मायूसी के साथ. मैं तुम्हारा नाम लिखते रहता हवाओं पर. और मैं पूछता था अपने खुदा से तुम इस वक़्त क्या कर रही होंगी. क्या तुमने कभी मेरी छुअन को महसूस किया या फिर हवाओं से पुकारती हुई मेरी आवाज़ को सुना. वैसे जब तुम ये पढ़ रही हो क्या तुम्हे पता है कि मैं तुम्हे देख रहा हूँ अपने शब्दों से झांककर!

मुझे बड़ा गुमान था कि सारी सड़के या तो तुझ तक पहुंचती है या फिर मेरे खुदा तक. मैं चलता रहा [ अब भी चल ही रहा हूँ एक झूठी उम्मीद के सहारे ]. जिस राह पर मेरे कदम पड़े थे वो राह निश्चित ही तुम तक कभी भी नहीं पहुंचेंगी,क्योंकि ये रास्ते विधाता ने बनाये है. मुझे विधाता के विधान से कोई एक शिकायत थोड़ी ही है.बहुत सी हैपर तुम तक न पहुँच पाना यकीनन मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ देता है. मैंने ईश्वर से कुछ ज्यादा थोड़े माँगा है. लेकिन देवता कब किसी की बाते सुनते है.

मैं अपनी प्रार्थना के साथ अकेला बैठा हूँ. और रात बीत रही है. देवता भी सो चुके है.लेकिन मैं तुम्हारे सपने के साथ जग रहा हूँ.कम से कम सपनो में तो मिलने आ जाओ.एक बार! तुमसे मिल लूंफिर मैं अपने खुदा से मिल लूँगा.

मैं तुमसे पूछना चाह रहा था कि क्या तुम्हारी हाथो की लकीरों में मेरा नाम है. या तुम्हारी किस्मत में मेरी परछाई है. मुझे यकीन है. पर तुम्हारा मुझे पता नहीं. किसी नजूमी से पूछ तो लो कि तुम्हारी ज़िन्दगी में क्या मैं हूँ ? किस्मत के फैसले भी तो अजीब होते है.

मेरे पास कई सवाल हैतुम्हारे पास शायद कुछ सवालों का जवाब होपर खुदा के पास तो हर सवाल का जवाब होता है. वो क्यों मूक बना रहता है. देवताओ को हमने पत्थर का क्या बनाया, वो बस पत्थर के ही हो गए. मेरे हर सवाल के तीन जवाब हैएक मेराएक तेरा और एक उस खुदा का. खुदा के जवाब मुझे नहीं सुनना है. हाँ तुम कहो न. झूठ ही कह दो. मैं सच मान लूँगा.

हमारा बहुत कुछ जानना ही प्रेम को न जानने में हमारी मदद करता हैहां नहम सारी दुनिया की बात जानते है और समझते है पर बस प्रेम को न जान पाते है और न ही समझ पाते हैदुनिया की दुनियादारी जो साथ साथ चलती है. क्या करे. पर मैं तुमसे कहू. मुझे तो तुमसे प्रेम है और तुम्हे ?

मैंने कुछ तस्वीरे ली थी तुम्हारी. और हर तस्वीर में थे धरती, आसमान, नदी, तुम और हाँ खुदा भी तो था! मैंने तुम्हे आसमान के साथ चाहा! मैंने तुम्हे नदी के बहते पानी के साथ चाहा! हाँ तुम्हे धरती के साथ भी माना. और जब खुदा की बारी आई तो मैंने पुछा कि इतनी देर से क्यों ? खुदा की मुस्कराहट कुछ अजीब सी थी. मैंने फिर एक ज़िन्दगी की मांग कीतेरे संग ! खुदा फिर मुस्कराया! मैं उसकी मुस्कराहट को न समझ सकाक्योंकि मैं तुम्हारी मुस्कराहट देख रहा था! और हाँ , हर तस्वीर में शायद मेरे प्रेम की आभा भी थी.

मुझे लगता है कि तुम तक पहुंचना बहुत आसान है मेरे लिए! पर इस राह में तीन दरवाजे है जो मुझे पार करने होते है. एक मेरा दरवाजा. एक दुनिया का दरवाज़ा और एक तुम्हारा दरवाज़ा. फिर तुम होती हो वहां अपनी मुस्कान के साथ और अपने स्पर्श के साथ! दरवाजे पार करने की कवायद में कहीं ये उम्र न बीत जाए,बस कुछ इसी बात का डर है मुझे! हाँ इन दरवाजो को पार करते हुए मैं तुम्हे देखते रहता हूँ कि कहीं तुम खो न जाओ,जब मैं अंतिम दरवाजे तक पहुंचू तो तुम मिलो वहां मुझेभले ही हमेशा के लिए न सहीपर मिलो तोकुछ लम्हों के लिए ही भला. मेरे लिए तो वो लम्हे ही अमूल्य होंगे!

जब मैंने तुम्हे उस दिन विदा किया तो बहुत देर तक वहां खड़ा रहा. तुम चली गयी और मैं सोचते रहा कि एक बार भी अगर तुम से मैंने कहा होता कि रुक जाओ तो क्या तुम रुक जाती. कहो तो ? नहीं न. पर मैंने मन ही मन कहाक्या तुमने सुना ? नहीं न. और अगर तुम सुन लेती तो क्या लौट आतीनहीं न. मैं अब भी कह रहा हूँरुक जाओआ जाओ. तुम सुन रही हो क्या ?

तुमसे मिलते ही शायद ये तय हो गया था कि छूटना है साथ! पता नहींलेकिन मैं देवताओ पर बहुत विश्वास करता था / हूँ. तुम चली गयी पर शायद नहीं गयी. हो न मेरे साथ मेरी यादो में. पीछे तो बहुत कुछ छूट गया है. मेरा खाली मन भी उन सामानों में से एक है. हाँ और जो रह गया हैउसमे तुम्हारी छुअनतुम्हारी साँसे, तुम्हारी बाते और तुम्हारी गहरी आँखे भी है. पता नहीं तुम क्या क्या साथ लेकर गयी हो. अगर मेरा कुछ है तो मुझे भी तो बताओ न !

मुझे तो लगता है कि हर बात आधी है. हमने जो जिया वो भी आधा और जो जियेंगे वो भी आधा. और जो न जी पायेंगे वो भी आधा ही होंगा. हम कुछ कदम चले वो भी हमने आधी दूरी ही तय की.हमने आधा आसमान देखाहमने आधी नदी देखीहमने आधे पर्वत देखेयहाँ तक कि जब भी देखते थे तो नाव भी आधी ही दिखती थी. कैसा कंट्रास्ट है लाइफ का. भला आधा कहीं होता है नहीं न पर हमारे मामले में ये आधा ही था. शब्द भी आधेसफ़र भी आधाज़िन्दगी भी आधी,उम्र भी आधीआह क्या मुझे पूरा कुछ मिल पायेंगाहाँप्रेम है नतुम्हारा प्रेम !

मिलना बिछड़नाफिर मिलना और फिर बिछड़नाक्या यही नियति है हमारी या यही नियति होंगी हमारी. मैं नहीं जानता. मैं जानना भी नहीं चाहता. मुझे डर लगता है,ज़िन्दगी से, किस्मत से और तुम से भी. भय है मुझे कि कहीं मैं तुम्हे खो न दूं. खोने का डर मुझे हमेशा ही रहा है. मैं तुम्हे खो कर रोना नहीं चाहता.

लेकिन क्या ये वाकई मेरे या तुम्हारे या हम दोनों के द्वारा संभव है,कहो तो. क्या हम भाग्य को जीत सकते हैकहो तोक्या हम भाग्य बदल सकते है, कहो तोक्या हम खुदा के निजाम को चुनोती दे सकते है. कहो तो.... पता नहीं.सच कहूँ तो मैं ये सब जानना ही नहीं चाहता. ये सब दुनियादारी की बाते है और मैं इन बातो में पड़ना नहीं चाहता. हाँ मैं ये जानता हूँ कि मैं तुम्हे चाहता हूँ और यही एक बात बहुत सी हज़ार बातो पर भारी है. हैं न!

मैं बहुत चुप रहता हूँ. मैं अपनी ज़िन्दगी में बहुत कम बात करता हूँहाँजब दुसरो के साथ होता हूँ तो बहुत हंसता हूँ बाते करता हूँपर मेरे निजी एकांत में सिर्फ मौन ही मेरा साथी होता है. मेरी प्रार्थनाये भी चुप ही होती है. मैंमेरे देवता और हम दोनों के मध्य का मौन और इसी मौन के अहोभाव में बसी हुई मेरी प्रार्थनायेइस प्रथ्वी के लिएइस संसार के मनुष्यों के लिएबच्चोस्त्रीयों, बुढो, वृक्ष, खेत और पशुओ के लिए. और उस दिन भी जब नदी के तट पर मैं अपने भीतर से जुड़ा तो उसी मौन में मैंने तुम्हे पाया. मेरे लिए तुम ईश्वर के किसी आशीर्वाद से कम नहीं हो.

और फिर मानना क्या हैजानना क्या है. जो तुम कहो, वही मान लूँगा और वही जान लूँगा. मेरे लिए तो मेरा और मेरे प्रेम का CIRCLE तुम पर आकर ही पूर्ण होता है. तुम मानो या न मानो. तुम जानो या न जानो. पर मेरा सच तो यही है. और मेरा प्रेम भी यही है!

हाँ ये भी हो सकता है कि बदलते वक़्त के साथ तुम्हारे आसमान अलग हो जाए या तुम्हारे आकाश की विस्तृता बड़ी हो जाए. असीम हो जाए. कौन जाने. हमारी आकांक्षाये बढती जाती है. कभी कभी ये इच्छाए और आकांक्षाये एक हथेली में नहीं समाती है इनके लिए एक आसमान भी कम पड़ता है. पर मेरी हथेली में मैं सिर्फ तुम्हारे नाम की लकीरों को चाहता हूँ. मैं ये भी चाहता हूँ कि मेरा जो भी आसमान हो वो बहुत बड़ा न हो. बस छोटा सा हो. बहुत छोटा सा. जिसमे मैं तुम्हारे साथ सांस ले सकूँतुम्हारे नाम की सांस ले सकूतुम्हे छु सकूँ, तुम्हे पा सकूँ और कह सकूँ कि हाँ तुम मेरी हो.

मैं ये भी नहीं चाहता हूँ कि हम बने-बनाए संबंधो में अपने आपको ढाल ले. मैं किसी और रूप में खुद को या तुम को और हम दोनों को नहीं देखना चाहता हूँ. जो कुछ भी हो बस हमारा ही होनयाठीक उस रात की यात्रा की तरहठीक उस नदी के बहते पानी की तरह या मेरे निर्वाण की तरह.. मोक्ष या तो मैं तुम्हारी आगोश में पाऊंगा या फिर बुद्ध के चरणों में! सच्ची!

हो सकता है कि एक दिन ऐसा आये कि सिर्फ शिकायते ही बची रहे हमारी हथेलियों में. हम भी तो मनुष्य ही है. हो सकता हैया होगा भी. कौन जाने. पर मेरा विश्वास करनामेरा प्रेम कम न होंगा. मान्यताये बदले, जरूरते बदले, जीवन बदले, सोच भी बदल जाएपर तुम्हारी कसममेरा प्रेम न बदलेंगा तुम्हारे लिएइस बात का वादा तो कर ही सकता हूँ. प्रेम पर धुल न चढ़े इस बात का ख्याल रहेंगा मुझे, हाँ वक़्त पर धुल बैठ जाये. हमें क्या. नहीं ?

बहुत बरसो का खालीपन था मेरे भीतर! तुमने भर दिया या मैंने ही उसे तुमसे भर दिया. दोनों एक ही बात नहीं है पर मेरे लिए एक ही है. ऐसे ही बावरा रहना चाहता हूँ. इसी में मेरी ख़ुशी हैयही मेरी जन्नत है. अगर ये झूठ है तो यही सही. लेकिन इसकी ख़ामोशी में बहुत से शब्द हैजो मेरे होकर भी मेरे नहीं है. तुम जानती होतुमने क्या क्या भरा मुझमे उस रात और उस दिन ? नहीं...मैं जानता हूँ. एक उम्र भरी है जिसमे एक मोहब्बत का अफसाना है.

तुम शायद पूछना चाहोंगीतो मैं बता दूंकि उस रात मैंने तुम्हे छूना चाहा था. मैं चाहता था छूना तुम्हारे गालो को और तुम्हारे होंठो को भी. मैं चाहता था छूना तुम्हारी साँसों को.और चाहता था छूना तुम्हारे दिल को जिसे मेरे दिल ने पहले छुआ था! मुझसे भी पहले छुआ था. और तुम जब संग बैठी थी तो एक आंच दिल में लगा गयी होवो आंच अब एक अलख बन कर जग रही है. तुम्हारी यादो के साथ!

तुमने उस रात मेरा हाथ थामा थामेरी हथेली की रेखाओ को पढने की कोशिश कर रही थी. तुम्हे कैसे बताऊँ कि रेखाए किस्मत नहीं होती है. रेखाए बस दूरियों को बताती है कि तुम कितनी दूर हो मुझसेया तुम्हे मुझसे मिलने में कितने जन्म लग गए या फिर शायद हमारी राहे अलग अलग है. पर मैंने कभी रेखाओं को नहीं माना है. हाँ खुदा को माना है,उसकी खुदाई को माना हैऔर हाँ न, तुम्हे भी तो माना है. सच में !

अक्सर लौट जाता हूँ उन सपनो से जो मैं तुम्हारे लिए देखता हूँ, क्योंकि तुम नहीं हो उन सपनो में. राहे जानी होती है लेकिन मुझे अनजानी लगती है. मैं देवताओ से प्रार्थना करता हूँ कि वो तुम्हे मेरी ज़िन्दगी में भेज दे. लेकिन देवता जवाब नहीं देते है. वो मुझे देखते है और मैं तुम्हे. कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ ख़त्म!

तय करना होता है बहुत सी बातो को. जीना भी होता है बहुत सी बातो को. जीने में और तय करके जीने में बहुत सा फर्क होता है. बस दोनों के मध्य तुम होती हो. जबकि मैं चाहता हूँ कि तुम या तो शुरुवात में रहो या फिर अंत में. और मैं बता दूं तुम्हे मैं अंत नहीं चाहता हूँ कभी भी!

सब कुछ कभी भी ख़त्म नहीं होता है. और न ही होंगा. ठहर जाने से तो कभी खत्म नहीं होता है. शायद इसे शुरुवात ही कह लो. मैं रुक जाऊं या तुम रुक जाओकुछ भी कभी भी ख़त्म नहीं होंगा!

मैंने तुम्हे ओक में जिया था उन लम्हों में. और ओक है कि खाली ही नहीं होतीअच्छा है न. कभी भी खाली न हो. मेरी साँसे भले खाली हो जाएलेकिन ओक खाली न हो. तुमसे भरी रहेतुम्हारी यादो से भरी रहे.जीवन से भरी रहे.प्रेम से भरी रहे.और हाँ खुदा की खुदाई से भी भरी रहे! तुम बस वादा करो कि कभी भी ये ओक जो तुमसे भरी हुई है खाली नहीं होंगी! तुम उसे खाली नहीं होने दोंगी!

मैं इस जन्म में फिर से तुम्हे समेटना चाहता हूँ उन्ही पत्थरो की बीच मेंउसी बहती नदी के बीच में. वैसे ही किसी नाव में. उन्ही हवाओ में !  इसी जन्म में. सच्ची! मिलोंगी न ?

कितनी बाते करनी होती है तुमसे........ लगता है ज़िन्दगी ख़त्म हो जायेंगीलेकिन बाते ख़त्म न होंगी. सच्ची! कितना कुछ कहना है तुमसेकुछ इस जन्म की बाते तो कुछ उस जन्म की बाते. कभी तो बहुत बाते और कभी तो कुछ भी नहीं. सिर्फ मौन. तुम और मैं. हम. सिर्फ हम. और हाँ प्रेम भी रहे. ताकि हम बचे रहे जीवित किसी और जन्म के लिए!

थोडा यकीन करना मेरा. थोडा यकीन करना खुदा का और थोडा कुछ तुम्हारी किस्मत का और थोडा कुछ मेरी किस्मत का! बस जीवन कट जायेंगा! लेकिन मैं तो लम्हों में जीना चाहता हूँ. जियोंगी मेरे साथ अपनी किस्मत के डोर लेकर ? कहो न!

तुम जानती होमैं कितना कुछ लिखना चाहता हूँऔर कौन जाने तुम इसे पढ़ भी पाती हो या नहीं. लेकिन क्या तुम उसे भी पढ़ लेती होजो मैंने नहीं लिखा! जानती हो उन अक्षरो कोउस भाषा को जिसे सिर्फ प्रेम की आँखे पढ़ पाती है. हाँ, उसके लिए प्रेम में होना जरुरी होता है. मैं हूँ. तुम्हारे प्रेम में. क्या तुम भी हो. एक बार तो कह दो!

जिन कदमो के निशान हमने छोड़े थे; वो क्या वही रहंगे उन राहो पर ,जिन पर हमने कुछ कदम साथ चले थे. वो फिजा जिसमे हमने साँसे ली थीवो सारी जगह जहाँ जहाँ मैंने तुम्हे देखाऔर हर बार पहली बार जैसे ही देखा. क्या वो सब कुछ हमेशा के लिए फ्रोजेन नहीं हो गया होंगा. सोचो तो. मुझे लगता है की हाँ वो फ्रोजेन है एक टाइम फ्रेम में हमेशा के लिए. तुम्हारे लिएमेरे लिएहमारे लिए.खुदा के लिए और प्रेम के लिए भी !

हर आने वाला कल बीता हुआ कल बन जाता है. और तुम कहती रहती हो कि कल !!! कल तो आकर भी चला जाता है पर तुम नहीं आती हो. आ जाओ या बुला लो. दोनों सूरतो में मैं तुम्हारा ही होना चाहता हूँ.

मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम मिल जाओंगी. पर मिली. भले ही कुछ समय के लिएपर मिली. भले ही खो जाने के लिए शायदपर मिली. अगर कभी न कुछ न मिला तो वो होंगा ज़िन्दगी का एक टुकड़ा जो मैं तुम्हारे साथ जीना चाहूँगा!

प्रेम अलग हैजीवन अलग हैसमाज अलग है,  प्रेम इन सब बातो से परे हैप्रेम समाज से परे होकर जीता है और वो उसका अपना ही समाज होता है. प्रेम की असफलता के कई कारण हो सकते है पर प्रेम के होने का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण हो सकता है और वो प्रेम ही है.

प्रेम हमेशा ही अधुरा होता है. जिसे हम पूर्णता समझते हैवो कभी भी प्रेम नहीं हो सकताप्रेम का कैनवास इतना बड़ा होता है कि एक ज़िन्दगी उसमे समाई नहीं जा सकती है. जब आप प्रेम में होते है तो आपको पता चलता है कि आप एक ज़िन्दगी भी जी रहे है.....और ज़िन्दगी परत दर परत ज़िन्दगी के रहस्य खोलती है. जिसे आप सिर्फ प्रेम ही समझते है और प्रेम में ही जीते है.... और ऐसा जादू सिर्फ और सिर्फ प्रेम में ही होता है...! जैसे कि अब हो रहा है मेरे साथ !

मोड़ कई ऐसे आयेंगेजब तुम मुझसे अलग होंगी या मैं तुमसे अलग होंगापर वो अलग होना हम दोनों को अलग नहीं कर सकता! At-least not me from you and I mean it !

और हांमुझे जब तुम प्रेम में हो जाओंगी , प्रेम को समझोंगी , तब ही मुझे प्रेम करना.जब मैं तुम्हारा हिस्सा बन जाऊं तब ही तुम मुझे प्रेम करना.जब तुम्हे लगे कि तुम मेरे भीतर के मासूम बच्चे से जुड़ जाओ तब ही मुझे प्रेम करना.जब तुम्हे लगे कि मैं हूँ तुम्हारी साँसों मेंतुम्हारी हथेली मेंतुम्हारे माथे पर और तुम्हारे ह्रदय के भीतर तब ही मुझे प्रेम करना. और जब लगे कि मैं आजन्म तुम्हारे साए का एक हिस्सा बन चूका हूँ तब ही मुझसे प्रेम करना.

ये भी हो सकता है कि तुम कभी भी मुझसे प्रेम न करो.हम सब एक mind-set के साथ ही जीना चाहते है जो कि comfort zone हो. और प्रेम तो निश्चिंत ही comfort zone  नहीं है. फैसला तुम पर ही छोड़ता हूँ.मेरा फैसला तो मैंने कर लिया है ! तुम जानती हो मेरे फैसले को. अब बारी तुम्हारी ही है. हो सकता है कि तुम न चाहो मुझे..... [ वैसे मैंने देवताओ से तुम्हे माँगा है पर देवता तो पत्थर के ही होते है न ]

तुम मेरी हमउम्र होती हो जब बात ख्यालो की होती हैबात अहसासों की होती हैबात ज़िन्दगी की होती है, बात प्रेम की होती है या फिर बात खुदा की होती है. सच्ची. हाँ जब बात खुदा की हो रही है तो कह दूं तुमसेकि शायद तुमसे पहले ही जाऊं इस फानी दुनिया से. लेकिन तुम गम न करना. बस ये सोचना कि कोई था जो कुछ दूर चला तुम्हारे साथ. कुछ शब्द तुम्हारी झोली में डाल गया. कुछ देर तुम्हे देखता रहा. कुछ वक़्त जिसमे हमने एक उम्र गुजारी.....बस ऐसी ही कई बेमतलब की बाते जो मेरे जाने के बाद भी शायद तुम्हे याद रहेंगी...क्या तुम उन लम्हों को याद करके अपने कुछ आंसू मेरे नाम करोंगी? वही तो मेरी सच्ची जायदाद रहेंगी! सच्ची!

::::::: प्रारम्भ :::::::::

कहानी अब शुरू होती है प्रिये. कहानी तो बहुत बार कही जा चुकी होगीबहुत बार सुनी जा चुकी होगीऔर कई बार दोहराई गयी होगी. पर मेरे लिए ये कथा नहीं हैक्योंकि इसमें तुम हो. हाँ अब आगे की कथा मैं तुम्हे सौंपता हूँ. तुम्हारी किस्मत को सौंपता हूँ

.......तुम्हारा मेल दोस्ती की हद को छु गया
दोस्ती मोहब्बत की हद तक गई!
मोहब्बत इश्क की हद तक!
और इश्क जूनून की हद तक!
.......अमृता प्रीतम
  
हाँप्रियेमुझे तुमसे प्रेम है.

दरअसल : असली प्रेम तो प्रेम में होना ही होता हैप्रेम में पढ़नाप्रेम में गिरनाप्रेम करना इत्यादि सिर्फ उपरी सतह के प्रेम होते है. असली प्रेम तो बस प्रेम में होनाप्रेम ही हो जाना होता है.प्रेम बस प्रेम ही ! और कुछ नहीं !

हाँ,प्रियेमुझे तुमसे प्रेम है.

अब इन्तजार है बची हुई सारी उम्र के लिए.
तुम्हारा और तुम्हारे प्रेम का !
मैंने अपने दिल के दरवाजे खोल रखे है.

स्वागत है प्रियेआ जाओ !!! 

© कथा और चित्र विजय कुमार 


18 comments:


  1. आदरणीय गुरुजनों और मित्रो ;
    नमस्कार ;

    मेरी नयी कहानी “प्रेमकथा – मैं तुम और प्रेम ” आप सभी को सौप रहा हूँ.

    ये एक कोलाज है जिसमे प्रेम के कई रूप अलग अलग भावो में व्यक्त किये गए है और पढ़ते हुए आपको बहुत सी अनुभूतियो से सहज रूप में मिलवाते है और पाठक अपने आपको ही इस कथा के एक पात्र के रूप में देखने लगता है !

    मुझे उम्मीद है कि मेरी ये छोटी सी कोशिश आप सभी को जरुर पसंद आएँगी.

    दोस्तों ; ये कहानी कैसे बन पढ़ी है, पढ़कर बताईये, कृपया अपने भावपूर्ण कमेंट से इस कहानी के बारे में लिखिए और मेरा हौसला बढाए । कृपया अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा. आपकी राय मुझे हमेशा कुछ नया लिखने की प्रेरणा देती है और आपकी राय निश्चिंत ही मेरे लिए अमूल्य निधि है.

    इस बार कहानी का plot / thought बनने में एक जन्म सा लग गया । कहानी लिखने में करीब 3 दिन लगे [ सबसे कम समय !!! ]

    आपके कमेंट्स का इन्तजार रहेंगा

    आपका बहुत आभार और धन्यवाद.
    आपका अपना

    विजय कुमार
    Email : vksappatti@gmail.com
    Mobile : +91 9849746500

    ReplyDelete
  2. bahut hi sundar sir....................

    ReplyDelete
  3. Vijay Ji , Aapkee Koee Kavita Pdhta Hun To Aap Shresh Kavi Lagte Hain Aur Koee
    Kahani Padhta Hun To Shreshth Kahanikar Lagte Hain .Chitrakar Bhee Aap Shresth Hain . Yah Kahani Bhee Achchhee Ban Padee Hai . Badhaaee .

    ReplyDelete
  4. इससे खूबसूरत प्रेम कहानी और कोई हो ही नहीं सकती....विजय आपने प्रेम को खो कर भी पूरा पा लिया..

    ReplyDelete
  5. comment on facebook :

    बहुत ही सुन्दर कहानी है😊👍 प्रेम कथा..मैं तुम और प्रेम.
    बहुत अच्छी लगी आपकी ये प्रेम रस में डूबी प्रेम कथा.. दिल को छू गई कहानी में प्रेम की अभिव्यक्ति पढते ही..पता चलता है की,आप कितने दिल से अपनी हरेक रचना लिखा करते हैं।शुरू से अन्त तक पढने के लिये मन उत्साहित रहता है..कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी..आप तो महान रचनाकार हैं..आपकी तारिफ करूंगी दिल से पर,आप की रचनाओं को पढना और उसकी तारिफ कुछ लिखेंगे तो वो कम ही है।
    क्योंकि की किसी भी तारिफ की जरूरत नहीं..आपकी हरेक रचनाएँ खुद ही अनमोल होती हैं..और मैं कुछ लिखूगीं तो वो कमेंट कम ही होगा।आपको शुभकामनाएं और बधाई विजय भईया..सेन्हआशिष के साथ सदा दिल से दुवायें आप यूहीं लिखा करें 🍃🌺🍃 आपकी लिखि हर रचना पढते रहेंगे बस आप लिखा करें यूहीं 🍃🌺🍃🌺🍃🌺🍃आप की इस सुन्दर प्रेम से भरी कहानी को लिखने के लिये ढेरों बधाई. 🌹🌹
    jaya lakshmi

    ReplyDelete
  6. यह प्रेमकथा एक बेचैन एकतरफा प्रेमी के प्रेमपत्र सी लगी। एक प्रेमी की गहरी संवेदनाओं और उसकी फ़लसफ़े को इतनी सुंदरता से प्रस्तुत कर पाने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।

    ReplyDelete
  7. comment from facebook :


    जय राम दिवाकर --- बहुत सुंदर


    Nishant Sharma --- बहुत शानदार. . बधाई. .। मेरे खयाल से हर किसी का प्यार अधूरा नहीं होता ।

    ReplyDelete
  8. facebook comment :

    Rita Thakur प्रिय मित्र ! सादर नमन् !आपकी कहानी आत्मकथ्य है ! कहानी में मूल कथानक होता है ! पात्र होते हैं।घटनायें व विश्लेषण होता है! तथा भाषा शिल्प का पक्ष होता है ! इन सबका समुचित अनुपात में सामंजस्य होना ही अच्छी कहानी बनाता है ! आप इस पक्ष से भी इस कहानी को देखें !
    4 hrs · Unlike · 1

    Vijay Sappatti Rita Thakur : shukriya ji , meri anay kahaniyo me aapke dwara bataaye gaye saare tatav hai . lekin ye kahani ek collage hai , so it is just full of many dimensions of love ! aap us nazariye se kahani ko padhiye . aapko accha lagenga ! dhanywaad ek baar phir se !
    30 mins · Like

    Rita Thakur आपके कथ्य में आत्मकथा का पुट है ! भाषा व भाव पक्ष भी सन्दर है ! सम्वेदनशील रचना ! इस तरह की कहानियाँ मैंने अमृता प्रीतम की भी पढ़ी हैं ! उनकी कहानियों में व आपके कथ्य में सजीवता व जीवन की सच्चाई को प्रभावपूर्ण भाषा शैली में व्यक्त किया है ! धन्यवाद !

    ReplyDelete
  9. बेहद ही उम्दा! ऐसा लगा जैसे मै कोई प्रेम की कविता पढ़ रहा हूँ जो कभी ख़त्म ही नही होगी...और हाँ सच तो यही है आदरणीय! विजय सर! ये कभी ख़त्म नही होगी! इसकी आवृत्ति हमेशा रहेगी मन के आसमान में!.........आपका बहुत बहुत आभार! इस प्रेममय कविता रुपी कथा के लिए!!...सादर!

    ReplyDelete
  10. आदरणीय महोदय,
    आपकी कहानी विशुद्ध प्रेम का अमृतपान कराती है। जीवन का प्याला इसी से तो लबालब भरा रहता है जो जब छलकता है तो अमृत बन जाता है कहानी की धारा सा बहता हुआ पाठकों तक पहुंच जाता है और जिन्दगी के स्तब्ध क्षणों को अपने आलिंगन में ले लेता है।
    बधाई।
    आपका,
    भूपेन्द्र कुमार दवे

    ReplyDelete
  11. आपकी रचनाएं मैं अक्‍सर पढ़ता रहता हूं । हार्ड काॅपी में भी । आप अच्‍छा लिखते हैं । इस कहानी को पूरा नहीं पढ़ पाया हूं , लेकिन विश्‍वास है, हमेशा की तरह अच्‍छी होगी । मेरी बधाई और शुभकामनाएं स्‍वीकार करें ।
    सादर ।

    शेर सिंह

    लखनऊ

    ReplyDelete
  12. कहानी अपने संपूर्ण कलेवर मे बेहद प्रभावपूर्ण है। कहानी का कथन,कथ्य और शिल्प सभी कुछ सम्मोहित करता है। पूरी कहानी मे प्रवाह ही नहीं उसमें बहा ले जाने वाली रवानी भी है। बधाई!
    -गुणशेखर

    ReplyDelete
  13. email comment :

    विजय कुमार सपाति की कहानी मैं ,तुम और प्रेम ,कहानी नही कविता हैं |प्रेम के माधुर्य ,उसकी मिठास की कविता; प्रेम के अंतर्द्वंद की भावभनी, रसमयी अभिव्यक्ति |प्रेम है स्वीकृति --दूसरे को स्वीकार करने की ऊर्जा |जब अहं के परदे गिरने लगते हैं ,प्रेम परत-दर परत खुलता चला जाता है |प्रेम है प्रेमास्पद के गुण सागर को आत्मसात करना,उसके सारे अभावों को भूल कर |प्रेमहै समर्पण ,अपनेपन का अर्पण स्वयं को नितांत रीता कर एकात्म भाव से अर्पित होजाना;जहाँ दिया जाता है ,पाने की सभी अभलाषाएं निशेष होजातीं हैं |प्रेम हैभक्ति जहां दो एक होजाते हैं --मेरो तो गिरधर गुपाल दुसरो नहीं कोई|विजय की कहानी बड़े कौशल ,तथा सुरुचि पूर्ण ढंग से इसी प्रेम को रेखांकित करती है ,हृदय में मखमली छुअन का एहसास कराते हुए, आज की रूखी सूखी जिंदगी में जहाँ प्रेम' वन नाईट स्टैंड'का पर्याय होगया है |बधाई शत शत बधाई --डॉ. मनोहर अभय

    ReplyDelete
  14. आप बधाई के पात्र हैं भाई

    ReplyDelete
  15. आप बधाई के पात्र हैं भाई

    ReplyDelete
  16. publish ebook with onlinegatha, get 85% Huge royalty,send Abstract today
    Ebook Publisher

    ReplyDelete