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Wednesday, March 25, 2015

प्रेमकथा - मैं तुम और प्रेम .............!!!

कोलाज़




::: प्रेमकथा - मैं, तुम और प्रेम :::

विजय कुमार सप्पत्ति

  
:: Address  ::  
VIJAY KUMAR SAPPATTI ,  
FLAT NO.402, FIFTH FLOOR, PRAMILA RESIDENCY;
HOUSE NO. 36-110/402, DEFENCE COLONY,
SAINIKPURI POST,  SECUNDERABAD- 500 094 [TELANGANA]






::: प्रेमकथा - मैं, तुम और प्रेम  :::


खुदा से बड़ा रंगरेज कोई दूसरा नहीं है वो किसे क्या देता है, क्यों देता है, कब देता है, ये उसके सिवा कोई न जाने.ये सब सिर्फ और सिर्फ वो रब ही जाने. मोहब्बत भी एक ऐसी ही नेमत है खुदा की. हमारी मोहब्बत भी उसी नेमत का एक नाम है, और हाँ न; एक और नाम है उस नेमत का – तुम !!!

:::::::::::: अंत :::::::::::

अक्सर जब मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि तुम नहीं हो...!
कही भी नहीं हो.
....बस तुम्हारा अहसास है......!
लेकिन क्या ये एक अंत है ?
मुझे तो यकीन नहीं है और तुम्हे ?

:::::::::::: मध्य :::::::::::

तुम मुझे देख रही थी.
और मैं तुम्हारे हाथो की उंगलियों को.
जाने क्या बात थी उनमे. मुझे लगता था कि तुम अपने हाथ को मेरे सीने से लगाकर कह दोगी कि तुम्हे मुझसे प्रेम है.

पर तुम कम कहती थी. मैं ज्यादा सुनने की चाह रखता था.
शब्द बहुत थे, लेकिन हम दोनों के लिए कम थे.

पहले मैं बहुत ज्यादा सोचता था और चाहता था कि तुम तक ये शब्द पहुँच जाए किसी तरह.
पर प्रेम और जीवन की राहे शायद अलग अलग होती है. शब्द अक्सर राहे बदल दिया करते थे. और मैं जीवन की प्रतीक्षा में जीवन को ही बहते देखता था.चुपचाप.

मैंने फिर लिख कर तुमसे अपने शब्दों की पहचान करवाई. तुम शब्दों को, मेरे शब्दों को जान जाती थी और समझ जाती थी कि मैं क्या कहना चाहता था. पर फिर भी तुम वो सब कुछ नहीं पढ़ पाती थी, जो मैं अपने शब्दों में छुपा कर भेजता था! हमारा लिखना पढना बेकार ही साबित हुआ!

फिर मैंने कहना शुरू किया और तुमने सुनना. अब तुम मेरे शब्दों की कम्पन को पहचान जाती थी. लेकिन तुमने वही सुना जो मैंने कहा. तुम वो न सुन सकी जो मैं कह नहीं पाया!

और अब अंत में मैंने मौन को अपनाया है. तुम जानती तो होगी कि मौन के भी स्वर होते है. तुम सुन रही हो न मुझे मेरे मौन में ?

मैं ये भी चाहता था कि सत्य जानो तुम और शायद मुझे भी जानना ही था सत्य! पर मैं चाहता था कि तुम पहले जानो और समझो कि मैं प्रेम में हूँ. तुम्हारे प्रेम में !

लेकिन तुमने प्रेम को पढ़ा था, सुना था और शायद जाना भी था पर समझा था कि नहीं ये मुझे नहीं पता था ; क्योंकि तुम मेरे प्रेम को पाकर असमंजस में थी. मैंने कोशिश की पर तुम जान न सकी.

क्योंकि तुम्हे प्रेम में होना पता न था! तुम सिर्फ प्रेम करना जानती थी. पर प्रेम में होना उसके बहुत आगे की घटना होती है और वही घटना मेरे साथ घट रही थी.

समय की गति और मन की गति के दरमियान प्रेम आ चूका था और अब एक बेवजह की जिद है कि प्रेम ज़िन्दगी को जीत ले.

प्रेम शिखर पर ही होता है
और हम इंसान उसके नीचे!
हमेशा ही!

उम्र के और समय के अपने फासले थे. मेरे और तुम्हारे दरमियान. तुम्हारे और मेरे दरमियान. हम दोनों और दुनिया के दरमियान. हम दोनों, दुनिया और ईश्वर के दरमियान!  सब कुछ कितना ठहरा हुआ था न. अब भी है. उम्र भी रुकी हुई ही है , समय भी ठहरा हुआ है और ज़िन्दगी भी रुकी हुई है !

याद है तुम्हे, हम एक बहती नदी के बीच में खड़े थे. पानी की छोटी छोटी लहरे हम दोनों के पैरों के बीच में से निकल जाती थी. तुम पानी को देख रही थी. और मैं सोच रहा था कि काश एक जीवन ही बीत जाता ऐसे ही. और ये भी सही है कि उस ज़िन्दगी का उम्र से क्या रिश्ता, जिन लम्हों में तुम मेरे साथ थी उसी में तुम्हे जी लिया. ज़िन्दगी को जी लिया. प्रेम को जी लिया. खुदा को जी लिया. सच में!

मुझे कभी तुम छु लेती. कभी तुम्हारा आसमान छु लेता, कभी तुम्हारी धरती मुझे आगोश में ले लेती. कभी तुममे मौजूद नदी मुझे भिगो देती. कभी तुममे मौजूद समंदर ही मुझे डुबो लेता. कभी कभी तो सच में तुम ही मुझे छु लेती. तुम्हारी छुअन को अब तक सहेजे रखा है मैंने अपने मन की परतो में. सच्ची!

और तुम्हारी इसी छुअन की वजह से मुझे अब मेरे जिंदा होने का अहसास होता है.

इंतज़ार बहुत लम्बा है. समय की सीमा से परे. तुम्हारे पुकार की तमन्ना रहती है. एक अधूरी आस. तुम पुकार लेती तो मन कह लेता न कि हाँ न, मैं हूँ. तुम हो और है हमारा प्रेम!

तुम्हे किसी से तो अपनी मन की कहनी थी भले वो तुम्हारी बेचैनी हो या फिर मन का तलाश, पर कहनी तो थी मुझसे कह ली, मुझे मेरा सकून तलाशना था बस इस तलाश की तलाश में कई और बाते भी जुड़ गयी और मैं तुम तक पहुँच गया. एक सफ़र यहाँ ख़त्म हो रहा था. या हो गया था और दूसरा शुरू होने वाला था या हो गया था. कौन जाने. खुदा जाने या तो तुम जानो. मैं भला क्या जानू.

खोज शुरू थी एक अनंत काल से. मैंने हर मुनसिब जगह ढूँढा तुम्हे. जहाँ देवता पूजे जाते थे वहां भी और वहां भी जहाँ धरती आकाश से मिलती थी. और वहां भी जहाँ अँधेरा उजाले से मिलता था. पता नहीं और भी कहाँ कहाँ! पता नहीं किस जन्म का नाता था तुमसे. तुम्हे सपनो में देखता था पहले, फिर अपनी नज्मो में. फिर मन में और फिर एक बहती नीली नदी के किनारे! तुम ही तो थी! सच !

जहाँ सब ख़त्म हो जाता है, वहां कुछ नए के शुरू होने की उम्मीद होती है. बस जहाँ रीते हुए जीवन की अंतिम बूँद बनी, वही पर आकर तुम मिली. और एक कथा शुरू हुई. नयी. मेरी और तुम्हारी. हाँ!

मुझे लिखना अच्छा लगता है. और ख़ास कर तुम्हे लिखना. और जब मैं तुम्हे लिखता हूँ तो बस सिर्फ तुम ही तो होती हो. और दूसरा कोई हो भी नहीं सकता न. मैं तुममे मौजूद स्त्री के प्रेम में हूँ और जब मैं उस स्त्री के प्रेम मे होता हूँ जो कि तुम हो तो मेरी कोई और दुनिया नहीं होती है. और सच कहूँ तो हो भी नहीं सकती! और जब तुम, तुममे मौजूद स्त्री और उस स्त्री में मौजूद प्रेम जो कि शायद मेरे लिए ही मौजूद होते है तब मैं लिखता हूँ अक्षर, प्रेम, कविता , कथा और ज़िन्दगी!

प्रेम कठिन नहीं होता, ये तो सबसे सरल भाव है जिसे हमने अहोभाव के साथ स्वीकार करना चाहिए. पर हाँ जब हम उसे समाज के साथ जोड़ देते है तो फिर प्रेम कठिन हो जाता है तब वो प्रेम आत्मिक न होकर सामाजिक हो जाता है और फिर भला समाज ने कब प्रेम का साथ दिया है! हैं न. तो आओ सिर्फ प्रेम करे. कुछ और न सोचे और न ही जाने! बस प्रेम करे!

मुझे तुमसे तब प्रेम नहीं हुआ, जब मैंने तुम्हे देखा था. और तब भी नहीं,जब मैंने तुम्हे पहली बार छुआ था और तब तो बिलकुल भी नहीं जब मैं तुम्हारे साथ कुछ कदम साथ चला था. हाँ जब उस बहती नदी ने कहा कि तुम मेरी soul mate हो और जब वहां मौजूद पर्वतो ने कहा कि तुम मेरी soul mate हो और उस बहती नाव ने कहा था कि तुम मेरी soul mate हो और उन मेघो से भरे आकाश ने कहा कि तुम मेरी soul mate हो – तब हाँ शायद तब मुझे प्रेम हुआ तुमसे. और फिर उसके बाद मुझे तुमसे प्रेम तब हुआ, जब तुमने मुझे देखा था. हाँ मुझे तुमसे प्रेम तब हुआ जब तुमने मुझे छुआ था और हाँ मुझे तुमसे प्रेम तब भी हुआ जब तुम कुछ कदम मेरे साथ चली थी. हाँ मुझे तुमसे प्रेम है.

नदी में तुम, रास्तो पर तुम, मंदिर में तुम ; धरती, जल और आकाश. हर जगह बस तुम. तुम से ही तो है न ये कायनात. प्रेम में जब इंसान होता है तो कुछ ऐसा ही तो लगता है. मुझे भी लगा. हाँ. मैं प्रेम में हूँ – तुम्हारे प्रेम में................ सच्ची!

याद है तुम्हे वो सर्दियों के दिन थे और एक रात हमने भी जी साथ साथ. वो भी सर्द थी. हाँ तब एक बार ये चाह उठी कि तुम से वो तीन शब्द कहता जो कि सदियों से दोहराए जा रहे थे. और आश्चर्य कि वो अब भी उतने ही ताज़े महसूस होते है. प्रेम होता ही कुछ ऐसा है. उस सर्द रात में ऐसे कई लम्हे थे, जब तुम मेरे मन तक पहुंची और मैंने उन्हें संजोकर रख दिया इस जन्म के लिए. उसी रात को पता नही ऐसा क्या बो दिया था तुमने मेरी आँखों में कि सपने उग आये है मेरे मन में. सच्ची. खैर वो तीन शब्द अब तक नहीं कहे जा चुके है. पता नहीं मेरी रूह की बारी कब आएँगी.

मैं चाहता था कि तुम्हे कुछ फूल दूं, पर जिन रास्तो पर हम चले, उन पर फूल नहीं थे. उनपर ज़िन्दगी थी. ज़िन्दगी, फूल और प्रेम ये तीनो ही अलग अलग दास्तानों की वजह है. ज़िन्दगी की अपनी राह होती है और प्रेम की अपनी. फूल ज़िन्दगी के लिए भी काम आते है और प्रेम के लिए. प्रेम में फूल अभिव्यक्ति बन जाते है - ज़िन्दगी के लिए. सो मैं जीना चाहता था / हूँ ; प्रेम के संग तुम्हारे साथ. भले ही वो कुछ लम्हे हो. पर देवताओ की साज़िश कुछ अलग होती है. उनकी बाते तो वही जाने. मैं अपनी कहता हूँ. तुम सुन सकती हो मुझे ? कहो तो!

समस्या वक़्त की है. मैं वक़्त के इन्तजार में हूँ. और एक दुआ भी साथ साथ करते रहता हूँ कि या तो वक़्त आ जाए या फिर तु ही आ जाए. वक़्त ही पहले आया. तुमने भी आना चाहा होंगा. पर वक़्त के आगे किसकी चली है और फिर जिन राहो पर चलकर तुम आना चाहती थी. वो शायद मुझ तक नहीं पहुँचती होंगी. या फिर जिस राह पर मैं चल था तुम तक पहुँचने के लिए शायद वो ही गलत थी. या फिर तुम मुझ तक पहुंचना ही नहीं चाहती...पर जो भी हो; कुछ ठहर गया है. हमेशा के लिए!

दिन पानी की तरह गुजर जाते है जैसे कोई बहती हुई नदी हो और रात यूँ बेअसर सी निकल जाती है जैसे ज़िन्दगी में एक ही रात आई हो, जो मैंने तुम्हारे संग जिया है. जीवन तो रेत की तरह फिसला है हाथो की लकीरों से. पर मैंने तुम्हारे प्रेम को अपनी ओक में लेकर अमृत की तरह पिया है इसलिए तो जीवित हूँ एक शब्द की गूँज की तरह! क्या जब तुम अकेली होती हो तो मेरे शब्दों की गूँज सुनाई देती है तुम्हे?

क्या किसी ने तुमसे पहले कहा है कि जब तुम खामोश रहती हो तो तब भी तुम कुछ कहती ही रहती हो. तुम्हारे अनकहे शब्द कुछ ज्यादा ही मुझ तक पहुँचते है. तुम जानती हो न कि मैं तुम्हारी ख़ामोशी को भी सुन लेता हूँ पर सवाल तुम्हारा है कि क्या तुमने मुझे पूरी तरह सुना ?

खैर मैंने यात्रा शुरू की है. ये यात्रा है मुझसे तुम तक और तुमसे मुझ तक और अंत में हम दोनों की प्रेम तक और प्रेम से अध्यात्म के अस्तित्व तक. देखते है क्या ये यात्रा हो भी पाती है या नहीं.क्योंकि जो चारवाह हमारी यात्रा करवा रहा है उसकी खुदाई हर बन्दे के लिए अलग ही होती है.

यात्रा पर हमारे साथ होंगे चन्द्रमा, तारे, बादल, सूरज, नदी, धरती, मेरा मैं और तुम्हारा तुम! इस यात्रा के साथ हमारे मन की भी यात्रा होंगी बाहर से भीतर की ओर और भीतर से बाहर की ओर.

दूसरी सारी यात्राये ख़त्म हो जायेंगी , बस हमारी ये यात्राये चलती रहेंगी. मैं तुमसे वादा करता हूँ कि मैं तुम्हारा इन्तजार करूँगा इस उम्र भर के लिए और उस यात्रा के लिए भी. हो सकता है कि हम रुक जाए पर मन चलते रहेंगे. और फिर एक दिन मन भी रुक जायेंगे.यात्रा अनंत है किसी मन की तरह .....और मन अशांत होता है. प्रेम शांत है. पर कहीं कुछ चुभता है. जीवन की फांस! हाँ!

शायर बशर नवाज़ साहब ने लिखा था करोंगे याद तो हर बात याद आएँगी. तुम्हे क्या क्या याद है. बताओ तो. मुझे तो सब कुछ याद है, तुम्हारा मुझे थामना, मेरे लिए चिंतित होना और हाँ, शायद मन के किसी कोने में मेरे अहसास को घर देना. ये सब बस हुआ है. हो गया है. ठीक उसी तरह से जैसे दुनिया के सबसे बड़े डायरेक्टर ने कहा होंगा. अब तुम ये करो और हम कर बैठे. ऐसे देखो और हमने देखा, ऐसे छुओ और हमने छुआ. और उसने ये भी कहा था कि प्रेम करो. मैंने तो सुन लिया था. और तुमने ?

जो होता है सब पहली बार ही होता है. इस पहली बार में भले ही शब्द पुराने हो, पर धड़कन नयी होती है. उन शब्दों की ज़िन्दगी नयी होती है. उनकी उम्र भी नयी होती है. उनकी तासीर नयी होती है. उनके जज़्बात नए होते है. पता नहीं तुमने ये सब कुछ महसूस किया या नहीं. पर मैंने तो इन्हें जी लिया, उन चंद शब्दों में जो तुमने मुझसे कहे.

तुम्हारा हँसना वो दूसरी बात थी जिसने मुझे तुरंत ही तुमसे जोड़ा. तुम्हारी हंसी में पता नही कितनी मुक्तता भरी हुई है. जीवन की मुक्तता, उड़ने की मुक्तता. पता नहीं कितने आकाश चाहिए होंगे तुम्हे खुद को पंख देने के लिए. या यूँ भी समझ लो, पता नहीं कितने पंख चाहिए होंगे तुम्हे इन आकाशो में उड़ने के लिए. तुम्हारे सपनो की उड़ानों में एक परवाज शायद मैं भी बन सकू. कौन जानता है. किसी की उड़ान को ! हाँ, कौन उड़ सकता है ये मुझे पता है. मैं और तुम.

प्रेम की संभावनाए अनंत है. जब हम किसी और लोक में होते है जो दुनियादारी से जुडी हुई होती है तो प्रेम की खुशबु मंद हो जाती है. हम इस कठोर और पागल समाज में अपने प्रेम को कैसे ढूंढें और कैसे बचाए रखे. पर जैसे कि मैंने कहा कि प्रेम की संभावनाए अनंत है. मैंने तो मेरा प्रेम तुममे ढूंढ लिया और संभव हो कि तुम्हारा प्रेम  भी मुझमे ही कहीं मौजूद हो. सवाल ढूँढने का है. तो ढूंढो! मैं अब भी तुम्हारी उस तलाश की प्रतीक्षा में हूँ जिसके द्वारा तुम मुझ तक पहुँचो.

मुझे लगता है कि तुम मौन में मुझसे कितना कुछ लेती हो. हाँ, ये एक सवाल जरुर है कि मैं उस अनकहे  को किस तरह से decode करता हूँ. पर अगर हम प्रेम के एक वेवलेंथ पर है तो फिर सुनना क्या, समझना क्या और जानना क्या. पर बताओ तो भला, क्या तुम मुझे decode कर सकी हो.

तुमने कहा था कि तुम मुझे पुकारोगी. मैं इन्तजार करता रहा. एक एक पल में मैंने जैसे सदियों का सफ़र तय किया हो. दिन ढलते ढलते रात में तब्दील हो गया और रात गुजरते गुजरते फिर दुसरे दिन में बदल गयी  न तुमने पुकारा और न ही मैंने उम्मीद छोड़ी. मैं भूल सा जाता था कि तुम्हारे अपने भी बंधन होगे, अपनी दुनिया होंगी, जिसमे मेरी तो यकीनन कोई जगह नहीं होंगी. लेकिन मेरी प्रार्थना तुम्हारे दिल में पनाह पाने की थी, न कि दुनिया में ;तुम्हारी दुनिया में. मेरी पनाह की ख्वाईश बहुत बड़ी न थी, लेकिन उसके लिए दिल का बड़ा होना जरुरी था. सो तुम्हारे एक पुकार की चाह में मेरी पनाह की ख्वाईश छुपी हुई है . न तुमने पुकारा और न ही मैंने अब तक उम्मीद छोड़ी है. मुझे तुम्हारे साथ लम्हों में जो जीना है. प्रेम लम्हों में ही तो होता है.

मुझसे शुरू होते दिनो को मैं भेज देता था तुम्हे छूकर वापस आने के लिए, पर किसी भी दिन ने मुझसे ये नहीं कहा कि वो तुम्हे छु पाया है. मैं इन्तजार करते रहता, दिन आते, तुम तक मैं उन्हें भेजता, और वो कभी भी वापस नहीं आते. हाँ राते आती जरुर एक मायूसी के साथ. मैं तुम्हारा नाम लिखते रहता हवाओं पर. और मैं पूछता था अपने खुदा से तुम इस वक़्त क्या कर रही होंगी. क्या तुमने कभी मेरी छुअन को महसूस किया या फिर हवाओं से पुकारती हुई मेरी आवाज़ को सुना. वैसे जब तुम ये पढ़ रही हो क्या तुम्हे पता है कि मैं तुम्हे देख रहा हूँ अपने शब्दों से झांककर!

मुझे बड़ा गुमान था कि सारी सड़के या तो तुझ तक पहुंचती है या फिर मेरे खुदा तक. मैं चलता रहा [ अब भी चल ही रहा हूँ एक झूठी उम्मीद के सहारे ]. जिस राह पर मेरे कदम पड़े थे वो राह निश्चित ही तुम तक कभी भी नहीं पहुंचेंगी,क्योंकि ये रास्ते विधाता ने बनाये है. मुझे विधाता के विधान से कोई एक शिकायत थोड़ी ही है.बहुत सी है, पर तुम तक न पहुँच पाना यकीनन मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ देता है. मैंने ईश्वर से कुछ ज्यादा थोड़े माँगा है. लेकिन देवता कब किसी की बाते सुनते है.

मैं अपनी प्रार्थना के साथ अकेला बैठा हूँ. और रात बीत रही है. देवता भी सो चुके है.लेकिन मैं तुम्हारे सपने के साथ जग रहा हूँ.कम से कम सपनो में तो मिलने आ जाओ.एक बार! तुमसे मिल लूं, फिर मैं अपने खुदा से मिल लूँगा.

मैं तुमसे पूछना चाह रहा था कि क्या तुम्हारी हाथो की लकीरों में मेरा नाम है. या तुम्हारी किस्मत में मेरी परछाई है. मुझे यकीन है. पर तुम्हारा मुझे पता नहीं. किसी नजूमी से पूछ तो लो कि तुम्हारी ज़िन्दगी में क्या मैं हूँ ? किस्मत के फैसले भी तो अजीब होते है.

मेरे पास कई सवाल है, तुम्हारे पास शायद कुछ सवालों का जवाब हो, पर खुदा के पास तो हर सवाल का जवाब होता है. वो क्यों मूक बना रहता है. देवताओ को हमने पत्थर का क्या बनाया, वो बस पत्थर के ही हो गए. मेरे हर सवाल के तीन जवाब है, एक मेरा, एक तेरा और एक उस खुदा का. खुदा के जवाब मुझे नहीं सुनना है. हाँ तुम कहो न. झूठ ही कह दो. मैं सच मान लूँगा.

हमारा बहुत कुछ जानना ही प्रेम को न जानने में हमारी मदद करता है, हां न, हम सारी दुनिया की बात जानते है और समझते है पर बस प्रेम को न जान पाते है और न ही समझ पाते है, दुनिया की दुनियादारी जो साथ साथ चलती है. क्या करे. पर मैं तुमसे कहू. मुझे तो तुमसे प्रेम है और तुम्हे ?

मैंने कुछ तस्वीरे ली थी तुम्हारी. और हर तस्वीर में थे – धरती, आसमान, नदी, तुम और हाँ खुदा भी तो था! मैंने तुम्हे आसमान के साथ चाहा! मैंने तुम्हे नदी के बहते पानी के साथ चाहा! हाँ तुम्हे धरती के साथ भी माना. और जब खुदा की बारी आई तो मैंने पुछा कि इतनी देर से क्यों ? खुदा की मुस्कराहट कुछ अजीब सी थी. मैंने फिर एक ज़िन्दगी की मांग की, तेरे संग ! खुदा फिर मुस्कराया! मैं उसकी मुस्कराहट को न समझ सका, क्योंकि मैं तुम्हारी मुस्कराहट देख रहा था! और हाँ , हर तस्वीर में शायद मेरे प्रेम की आभा भी थी.

मुझे लगता है कि तुम तक पहुंचना बहुत आसान है मेरे लिए! पर इस राह में तीन दरवाजे है जो मुझे पार करने होते है. एक मेरा दरवाजा. एक दुनिया का दरवाज़ा और एक तुम्हारा दरवाज़ा. फिर तुम होती हो वहां अपनी मुस्कान के साथ और अपने स्पर्श के साथ! दरवाजे पार करने की कवायद में कहीं ये उम्र न बीत जाए,बस कुछ इसी बात का डर है मुझे! हाँ इन दरवाजो को पार करते हुए मैं तुम्हे देखते रहता हूँ कि कहीं तुम खो न जाओ,जब मैं अंतिम दरवाजे तक पहुंचू तो तुम मिलो वहां मुझे, भले ही हमेशा के लिए न सही, पर मिलो तो, कुछ लम्हों के लिए ही भला. मेरे लिए तो वो लम्हे ही अमूल्य होंगे!

जब मैंने तुम्हे उस दिन विदा किया तो बहुत देर तक वहां खड़ा रहा. तुम चली गयी और मैं सोचते रहा कि एक बार भी अगर तुम से मैंने कहा होता कि रुक जाओ तो क्या तुम रुक जाती. कहो तो ? नहीं न. पर मैंने मन ही मन कहा, क्या तुमने सुना ? नहीं न. और अगर तुम सुन लेती तो क्या लौट आती, नहीं न. मैं अब भी कह रहा हूँ, रुक जाओ, आ जाओ. तुम सुन रही हो क्या ?

तुमसे मिलते ही शायद ये तय हो गया था कि छूटना है साथ! पता नहीं, लेकिन मैं देवताओ पर बहुत विश्वास करता था / हूँ. तुम चली गयी पर शायद नहीं गयी. हो न मेरे साथ मेरी यादो में. पीछे तो बहुत कुछ छूट गया है. मेरा खाली मन भी उन सामानों में से एक है. हाँ और जो रह गया है, उसमे तुम्हारी छुअन, तुम्हारी साँसे, तुम्हारी बाते और तुम्हारी गहरी आँखे भी है. पता नहीं तुम क्या क्या साथ लेकर गयी हो. अगर मेरा कुछ है तो मुझे भी तो बताओ न !

मुझे तो लगता है कि हर बात आधी है. हमने जो जिया वो भी आधा और जो जियेंगे वो भी आधा. और जो न जी पायेंगे वो भी आधा ही होंगा. हम कुछ कदम चले वो भी हमने आधी दूरी ही तय की.हमने आधा आसमान देखा, हमने आधी नदी देखी, हमने आधे पर्वत देखे, यहाँ तक कि जब भी देखते थे तो नाव भी आधी ही दिखती थी. कैसा कंट्रास्ट है लाइफ का. भला आधा कहीं होता है नहीं न पर हमारे मामले में ये आधा ही था. शब्द भी आधे, सफ़र भी आधा, ज़िन्दगी भी आधी,उम्र भी आधी, आह क्या मुझे पूरा कुछ मिल पायेंगा, हाँ, प्रेम है न, तुम्हारा प्रेम !

मिलना बिछड़ना, फिर मिलना और फिर बिछड़ना, क्या यही नियति है हमारी या यही नियति होंगी हमारी. मैं नहीं जानता. मैं जानना भी नहीं चाहता. मुझे डर लगता है,ज़िन्दगी से, किस्मत से और तुम से भी. भय है मुझे कि कहीं मैं तुम्हे खो न दूं. खोने का डर मुझे हमेशा ही रहा है. मैं तुम्हे खो कर रोना नहीं चाहता.

लेकिन क्या ये वाकई मेरे या तुम्हारे या हम दोनों के द्वारा संभव है,कहो तो. क्या हम भाग्य को जीत सकते है, कहो तो, क्या हम भाग्य बदल सकते है, कहो तो, क्या हम खुदा के निजाम को चुनोती दे सकते है. कहो तो.... पता नहीं.सच कहूँ तो मैं ये सब जानना ही नहीं चाहता. ये सब दुनियादारी की बाते है और मैं इन बातो में पड़ना नहीं चाहता. हाँ मैं ये जानता हूँ कि मैं तुम्हे चाहता हूँ और यही एक बात बहुत सी हज़ार बातो पर भारी है. हैं न!

मैं बहुत चुप रहता हूँ. मैं अपनी ज़िन्दगी में बहुत कम बात करता हूँ, हाँ, जब दुसरो के साथ होता हूँ तो बहुत हंसता हूँ बाते करता हूँ, पर मेरे निजी एकांत में सिर्फ मौन ही मेरा साथी होता है. मेरी प्रार्थनाये भी चुप ही होती है. मैं, मेरे देवता और हम दोनों के मध्य का मौन और इसी मौन के अहोभाव में बसी हुई मेरी प्रार्थनाये, इस प्रथ्वी के लिए, इस संसार के मनुष्यों के लिए, बच्चो, स्त्रीयों, बुढो, वृक्ष, खेत और पशुओ के लिए. और उस दिन भी जब नदी के तट पर मैं अपने भीतर से जुड़ा तो उसी मौन में मैंने तुम्हे पाया. मेरे लिए तुम ईश्वर के किसी आशीर्वाद से कम नहीं हो.

और फिर मानना क्या है, जानना क्या है. जो तुम कहो, वही मान लूँगा और वही जान लूँगा. मेरे लिए तो मेरा और मेरे प्रेम का CIRCLE तुम पर आकर ही पूर्ण होता है. तुम मानो या न मानो. तुम जानो या न जानो. पर मेरा सच तो यही है. और मेरा प्रेम भी यही है!

हाँ ये भी हो सकता है कि बदलते वक़्त के साथ तुम्हारे आसमान अलग हो जाए या तुम्हारे आकाश की विस्तृता बड़ी हो जाए. असीम हो जाए. कौन जाने. हमारी आकांक्षाये बढती जाती है. कभी कभी ये इच्छाए और आकांक्षाये एक हथेली में नहीं समाती है इनके लिए एक आसमान भी कम पड़ता है. पर मेरी हथेली में मैं सिर्फ तुम्हारे नाम की लकीरों को चाहता हूँ. मैं ये भी चाहता हूँ कि मेरा जो भी आसमान हो वो बहुत बड़ा न हो. बस छोटा सा हो. बहुत छोटा सा. जिसमे मैं तुम्हारे साथ सांस ले सकूँ, तुम्हारे नाम की सांस ले सकू, तुम्हे छु सकूँ, तुम्हे पा सकूँ और कह सकूँ कि हाँ तुम मेरी हो.

मैं ये भी नहीं चाहता हूँ कि हम बने-बनाए संबंधो में अपने आपको ढाल ले. मैं किसी और रूप में खुद को या तुम को और हम दोनों को नहीं देखना चाहता हूँ. जो कुछ भी हो बस हमारा ही हो, नया, ठीक उस रात की यात्रा की तरह, ठीक उस नदी के बहते पानी की तरह या मेरे निर्वाण की तरह.. मोक्ष या तो मैं तुम्हारी आगोश में पाऊंगा या फिर बुद्ध के चरणों में! सच्ची!

हो सकता है कि एक दिन ऐसा आये कि सिर्फ शिकायते ही बची रहे हमारी हथेलियों में. हम भी तो मनुष्य ही है. हो सकता है, या होगा भी. कौन जाने. पर मेरा विश्वास करना, मेरा प्रेम कम न होंगा. मान्यताये बदले, जरूरते बदले, जीवन बदले, सोच भी बदल जाए, पर तुम्हारी कसम, मेरा प्रेम न बदलेंगा तुम्हारे लिए, इस बात का वादा तो कर ही सकता हूँ. प्रेम पर धुल न चढ़े इस बात का ख्याल रहेंगा मुझे, हाँ वक़्त पर धुल बैठ जाये. हमें क्या. नहीं ?

बहुत बरसो का खालीपन था मेरे भीतर! तुमने भर दिया या मैंने ही उसे तुमसे भर दिया. दोनों एक ही बात नहीं है पर मेरे लिए एक ही है. ऐसे ही बावरा रहना चाहता हूँ. इसी में मेरी ख़ुशी है, यही मेरी जन्नत है. अगर ये झूठ है तो यही सही. लेकिन इसकी ख़ामोशी में बहुत से शब्द है, जो मेरे होकर भी मेरे नहीं है. तुम जानती हो, तुमने क्या क्या भरा मुझमे उस रात और उस दिन ? नहीं...मैं जानता हूँ. एक उम्र भरी है जिसमे एक मोहब्बत का अफसाना है.

तुम शायद पूछना चाहोंगी, तो मैं बता दूं, कि उस रात मैंने तुम्हे छूना चाहा था. मैं चाहता था छूना तुम्हारे गालो को और तुम्हारे होंठो को भी. मैं चाहता था छूना तुम्हारी साँसों को.और चाहता था छूना तुम्हारे दिल को जिसे मेरे दिल ने पहले छुआ था! मुझसे भी पहले छुआ था. और तुम जब संग बैठी थी तो एक आंच दिल में लगा गयी हो, वो आंच अब एक अलख बन कर जग रही है. तुम्हारी यादो के साथ!

तुमने उस रात मेरा हाथ थामा था, मेरी हथेली की रेखाओ को पढने की कोशिश कर रही थी. तुम्हे कैसे बताऊँ कि रेखाए किस्मत नहीं होती है. रेखाए बस दूरियों को बताती है कि तुम कितनी दूर हो मुझसे, या तुम्हे मुझसे मिलने में कितने जन्म लग गए या फिर शायद हमारी राहे अलग अलग है. पर मैंने कभी रेखाओं को नहीं माना है. हाँ खुदा को माना है,उसकी खुदाई को माना है, और हाँ न, तुम्हे भी तो माना है. सच में !

अक्सर लौट जाता हूँ उन सपनो से जो मैं तुम्हारे लिए देखता हूँ, क्योंकि तुम नहीं हो उन सपनो में. राहे जानी होती है लेकिन मुझे अनजानी लगती है. मैं देवताओ से प्रार्थना करता हूँ कि वो तुम्हे मेरी ज़िन्दगी में भेज दे. लेकिन देवता जवाब नहीं देते है. वो मुझे देखते है और मैं तुम्हे. कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ ख़त्म!

तय करना होता है बहुत सी बातो को. जीना भी होता है बहुत सी बातो को. जीने में और तय करके जीने में बहुत सा फर्क होता है. बस दोनों के मध्य तुम होती हो. जबकि मैं चाहता हूँ कि तुम या तो शुरुवात में रहो या फिर अंत में. और मैं बता दूं तुम्हे मैं अंत नहीं चाहता हूँ कभी भी!

सब कुछ कभी भी ख़त्म नहीं होता है. और न ही होंगा. ठहर जाने से तो कभी खत्म नहीं होता है. शायद इसे शुरुवात ही कह लो. मैं रुक जाऊं या तुम रुक जाओ, कुछ भी कभी भी ख़त्म नहीं होंगा!

मैंने तुम्हे ओक में जिया था उन लम्हों में. और ओक है कि खाली ही नहीं होती, अच्छा है न. कभी भी खाली न हो. मेरी साँसे भले खाली हो जाए, लेकिन ओक खाली न हो. तुमसे भरी रहे, तुम्हारी यादो से भरी रहे.जीवन से भरी रहे.प्रेम से भरी रहे.और हाँ खुदा की खुदाई से भी भरी रहे! तुम बस वादा करो कि कभी भी ये ओक जो तुमसे भरी हुई है खाली नहीं होंगी! तुम उसे खाली नहीं होने दोंगी!

मैं इस जन्म में फिर से तुम्हे समेटना चाहता हूँ उन्ही पत्थरो की बीच में, उसी बहती नदी के बीच में. वैसे ही किसी नाव में. उन्ही हवाओ में !  इसी जन्म में. सच्ची! मिलोंगी न ?

कितनी बाते करनी होती है तुमसे........ लगता है ज़िन्दगी ख़त्म हो जायेंगी, लेकिन बाते ख़त्म न होंगी. सच्ची! कितना कुछ कहना है तुमसे, कुछ इस जन्म की बाते तो कुछ उस जन्म की बाते. कभी तो बहुत बाते और कभी तो कुछ भी नहीं. सिर्फ मौन. तुम और मैं. हम. सिर्फ हम. और हाँ प्रेम भी रहे. ताकि हम बचे रहे जीवित किसी और जन्म के लिए!

थोडा यकीन करना मेरा. थोडा यकीन करना खुदा का और थोडा कुछ तुम्हारी किस्मत का और थोडा कुछ मेरी किस्मत का! बस जीवन कट जायेंगा! लेकिन मैं तो लम्हों में जीना चाहता हूँ. जियोंगी मेरे साथ अपनी किस्मत के डोर लेकर ? कहो न!

तुम जानती हो, मैं कितना कुछ लिखना चाहता हूँ, और कौन जाने तुम इसे पढ़ भी पाती हो या नहीं. लेकिन क्या तुम उसे भी पढ़ लेती हो, जो मैंने नहीं लिखा! जानती हो उन अक्षरो को, उस भाषा को जिसे सिर्फ प्रेम की आँखे पढ़ पाती है. हाँ, उसके लिए प्रेम में होना जरुरी होता है. मैं हूँ. तुम्हारे प्रेम में. क्या तुम भी हो. एक बार तो कह दो!

जिन कदमो के निशान हमने छोड़े थे; वो क्या वही रहंगे उन राहो पर ,जिन पर हमने कुछ कदम साथ चले थे. वो फिजा जिसमे हमने साँसे ली थी, वो सारी जगह जहाँ जहाँ मैंने तुम्हे देखा, और हर बार पहली बार जैसे ही देखा. क्या वो सब कुछ हमेशा के लिए फ्रोजेन नहीं हो गया होंगा. सोचो तो. मुझे लगता है की हाँ वो फ्रोजेन है एक टाइम फ्रेम में हमेशा के लिए. तुम्हारे लिए, मेरे लिए, हमारे लिए.खुदा के लिए और प्रेम के लिए भी !

हर आने वाला कल बीता हुआ कल बन जाता है. और तुम कहती रहती हो कि कल !!! कल तो आकर भी चला जाता है पर तुम नहीं आती हो. आ जाओ या बुला लो. दोनों सूरतो में मैं तुम्हारा ही होना चाहता हूँ.

मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम मिल जाओंगी. पर मिली. भले ही कुछ समय के लिए, पर मिली. भले ही खो जाने के लिए शायद, पर मिली. अगर कभी न कुछ न मिला तो वो होंगा ज़िन्दगी का एक टुकड़ा जो मैं तुम्हारे साथ जीना चाहूँगा!

प्रेम अलग है, जीवन अलग है, समाज अलग है,  प्रेम इन सब बातो से परे है, प्रेम समाज से परे होकर जीता है और वो उसका अपना ही समाज होता है. प्रेम की असफलता के कई कारण हो सकते है पर प्रेम के होने का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण हो सकता है और वो प्रेम ही है.

प्रेम हमेशा ही अधुरा होता है. जिसे हम पूर्णता समझते है, वो कभी भी प्रेम नहीं हो सकता. प्रेम का कैनवास इतना बड़ा होता है कि एक ज़िन्दगी उसमे समाई नहीं जा सकती है. जब आप प्रेम में होते है तो आपको पता चलता है कि आप एक ज़िन्दगी भी जी रहे है.....और ज़िन्दगी ; परत दर परत ज़िन्दगी के रहस्य खोलती है. जिसे आप सिर्फ प्रेम ही समझते है और प्रेम में ही जीते है.... और ऐसा जादू सिर्फ और सिर्फ प्रेम में ही होता है...! जैसे कि अब हो रहा है मेरे साथ !

मोड़ कई ऐसे आयेंगे, जब तुम मुझसे अलग होंगी या मैं तुमसे अलग होंगा, पर वो अलग होना हम दोनों को अलग नहीं कर सकता! At-least not me from you and I mean it !

और हां, मुझे जब तुम प्रेम में हो जाओंगी , प्रेम को समझोंगी , तब ही मुझे प्रेम करना.जब मैं तुम्हारा हिस्सा बन जाऊं तब ही तुम मुझे प्रेम करना.जब तुम्हे लगे कि तुम मेरे भीतर के मासूम बच्चे से जुड़ जाओ तब ही मुझे प्रेम करना.जब तुम्हे लगे कि मैं हूँ तुम्हारी साँसों में, तुम्हारी हथेली में, तुम्हारे माथे पर और तुम्हारे ह्रदय के भीतर तब ही मुझे प्रेम करना. और जब लगे कि मैं आजन्म तुम्हारे साए का एक हिस्सा बन चूका हूँ तब ही मुझसे प्रेम करना.

ये भी हो सकता है कि तुम कभी भी मुझसे प्रेम न करो.हम सब एक mind-set के साथ ही जीना चाहते है जो कि comfort zone हो. और प्रेम तो निश्चिंत ही comfort zone  नहीं है. फैसला तुम पर ही छोड़ता हूँ.मेरा फैसला तो मैंने कर लिया है ! तुम जानती हो मेरे फैसले को. अब बारी तुम्हारी ही है. हो सकता है कि तुम न चाहो मुझे..... [ वैसे मैंने देवताओ से तुम्हे माँगा है पर देवता तो पत्थर के ही होते है न ]

तुम मेरी हमउम्र होती हो जब बात ख्यालो की होती है, बात अहसासों की होती है, बात ज़िन्दगी की होती है, बात प्रेम की होती है या फिर बात खुदा की होती है. सच्ची. हाँ जब बात खुदा की हो रही है तो कह दूं तुमसे, कि शायद तुमसे पहले ही जाऊं इस फानी दुनिया से. लेकिन तुम गम न करना. बस ये सोचना कि कोई था जो कुछ दूर चला तुम्हारे साथ. कुछ शब्द तुम्हारी झोली में डाल गया. कुछ देर तुम्हे देखता रहा. कुछ वक़्त जिसमे हमने एक उम्र गुजारी.....बस ऐसी ही कई बेमतलब की बाते जो मेरे जाने के बाद भी शायद तुम्हे याद रहेंगी...क्या तुम उन लम्हों को याद करके अपने कुछ आंसू मेरे नाम करोंगी? वही तो मेरी सच्ची जायदाद रहेंगी! सच्ची!

::::::: प्रारम्भ :::::::::

कहानी अब शुरू होती है प्रिये. कहानी तो बहुत बार कही जा चुकी होगी, बहुत बार सुनी जा चुकी होगी, और कई बार दोहराई गयी होगी. पर मेरे लिए ये कथा नहीं है, क्योंकि इसमें तुम हो. हाँ अब आगे की कथा मैं तुम्हे सौंपता हूँ. तुम्हारी किस्मत को सौंपता हूँ, 

.......तुम्हारा मेल दोस्ती की हद को छु गया
दोस्ती मोहब्बत की हद तक गई!
मोहब्बत इश्क की हद तक!
और इश्क जूनून की हद तक!
.......अमृता प्रीतम
  
हाँ, प्रिये, मुझे तुमसे प्रेम है.

दरअसल : असली प्रेम तो प्रेम में होना ही होता है, प्रेम में पढ़ना, प्रेम में गिरना, प्रेम करना इत्यादि सिर्फ उपरी सतह के प्रेम होते है. असली प्रेम तो बस प्रेम में होना, प्रेम ही हो जाना होता है.प्रेम बस प्रेम ही ! और कुछ नहीं !

हाँ,प्रिये, मुझे तुमसे प्रेम है.

अब इन्तजार है बची हुई सारी उम्र के लिए.
तुम्हारा और तुम्हारे प्रेम का !
मैंने अपने दिल के दरवाजे खोल रखे है.

स्वागत है प्रिये. आ जाओ !!! 

© कथा और चित्र विजय कुमार 


Tuesday, January 14, 2014

दोस्ती, प्यार और ज़िन्दगी का चौराहा !




दोस्ती, प्यार और ज़िन्दगी का चौराहा !

करीब ८ महीने पहले………………….!

डॉक्टर वर्मा ने मुझे अपने करीब बिठाया और कहा, “देखो देव, तुम एक संवेदनशील कवि और लेखक हो, मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा। तुम लंग कैंसर की एडवांस स्टेज पर हो। तुम्हारी सिगरेट पीने की आदत ने तुम्हे ख़तम कर दिया है। अब ज्यादा से ज्यादा ६ या ८ महीने बस !”
मैंने उसे गले से लगा लिया, “यार वर्मा, तुमने तो मेरी ज़िन्दगी की सबसे अच्छी खबर मुझे सुनाई है, पता नहीं कितने बरसो की मेरी ये तमन्ना थी कि मैं मर जाऊं। शुक्रिया तुम्हारा और सिगरेट का!”
डॉक्टर वर्मा की आँखे भीग गयी, “अब मैं तुम्हारी कविताये नहीं पढ़ पाऊंगा, इस बात का मुझे ज्यादा, बहुत ज्यादा दुःख है।”
मैंने उसे फिर से गले लगा लिया, “यार अब कुछ अगले जनम के लिए तो रखो!”

करीब ४ महीने पहले………………………!

मैंने इन्टरनेट में सर्च किया और उसका पता ढूँढा और उसे फ़ोन किया। मैंने कहा, “मैं देव बोल रहा हूँ निम्मो, एक बार मिलना है, शायद आखरी बार। जल्दी से मिलने आ जाओ।”
बहुत देर की ख़ामोशी के बाद उसकी हिचकियो से भरी हुई भीगी हुई आवाज़ आयी, “अब? इतने बरस बाद? क्या तुमने मुझे माफ़ कर दिया देव? क्या तुम्हारे मन में मेरे लिए अब कोई नफरत नहीं रही?”
मैंने कहा, “माफ़ी? प्रेम में माफ़ी? हाँ, क्रोध रह सकता है पर कोई उससे कैसे नफरत करे जिसे टूट-टूट कर चाहा हो। जीवन के इस मोड़ पर मैं माफ़ी जैसे शब्द से ऊपर, बहुत ऊपर उठ चूका हूँ। बस जीवन के आखरी कुछ दिन बचे हुए है। तुम्हे देखना चाहता हूँ एक बार! हाँ ; बेटी को लेते आना। और अमित को भी। उसे कुछ देना है”
दूसरी ओर बहुत देर तक रोने की आवाज़ आती रही! यहाँ भी सात समंदर पार आकाश भीगा सा रहा, असमय मेघो ने बारिश की। मेरे आँखों के साथ मेरा मन भी भीग गया।

आज सुबह………………………!

घर के दरवाजे पर दस्तक भी हुई और घंटी भी बजी, मैं पूजा कर रहा था।
मैंने प्रभु को प्रणाम करते हुए दरवाजे की तरफ देखते हुए कहा, “आ रहा हूँ भाई, ज़रा रुक जाओ”
मैंने अपना चश्मा पहना और फिर धीरे धीरे चलते हुए दरवाजे की ओर बढ़ा और फिर दरवाजा खोला। पुराना दरवाजा था, कुछ आवाज़ करते हुए खुला।

सामने जो शख्स खड़ा था, उसे देखकर मैं चौंका। मैं समझा, मेरी नजरो का धोखा होंगा, मैंने अपने चश्मे को साफ़ किया और उस शख्स को गौर से देखा। वो मुस्कराता हुआ खड़ा था और मैंने उसे पहचान लिया।
वो अमित था!
मुझे आभास हुआ कि मैंने जो फ़ोन किया था, शायद वो बात मान ली गयी है।
उसने कहा, “देव मैं हूँ अमित, पहचाना या पूरी तरह से भूल गया?”
मैंने कहा, “नहीं। मैं तुझे कैसे भूल सकता हूँ, कभी भी नहीं, कम से कम इस जन्म में तो नहीं।”
वो मुस्कराया, “हां न, मैंने तो काम ही कुछ ऐसा किया था। खैर तूने मुझे बुलाया है। मुझे अन्दर नहीं बुलाएंगा रे।”
मैंने कहा, “आना। अन्दर आ, तेरा ही घर है।”
मैंने उसके कंधे के पार देखा। दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आया।
मैंने अमित की ओर देखा, वो मुझे ही देख रहा था। जैसे ही उससे नज़रे मिली, वो मुस्कराया। “अब भी तेरी आँखे उसे तलाश करती है देव?” उसने मुझसे पुछा।
मैंने कोई जवाब नहीं दिया, जिसे मैंने दिल से चाहा हो, उसे तो हमेशा ही मेरी नज़रे ढूंढेंगी। ये बात ये व्यापारी क्या समझेंगा।
वो अन्दर आया, चारो तरफ देखा, और कहा, “वैसे ही है रे। कुछ भी तो नहीं बदला। हाँ शायद सफेदी करवाई है बस और कुछ नहीं।”
मैंने कुछ नहीं कहा। उससे क्या कहता।
वो भीतर आया और घर के किनारे में रखे हुए सोफे पर बैठ गया।
उसने हँसते हुए कहा, “देव, कुछ भी तो नहीं बदला है। सब कुछ वैसे ही रखा हुआ है। वही पुराना घर। पुराना सोफ़ा, पुराना फर्नीचर, तेरी तरह!”
मैंने उसकी ओर देखा और कहा, “हां तो, क्या हुआ, मेरा मन इसमें लगता है। बस वही मेरे लिए काफी है। और फिर मुझे मेरा पुरानापन पसंद है।”
उसने हँसते हुए कहा, “मेरा घर इससे कई गुना बड़ा और खूबसूरत है, आज आधे संसार में मेरे घर बने हुए है, इससे अच्छा सोफ़ा तो मेरे नौकर के घर में होंगा।” कहकर उसने खिल्ली उड़ाने वाली नज़र से मुझे देखा। वो मेरी हंसी उड़ा रहा था।
मैं चुप रहा। मैंने उसे गहरी नज़र से देखा और कहा, “तू बदला नहीं अमित।”
उसने कहा, “इसमें बदलने की क्या बात है, जो है सो वही मैने कहा।”
मैंने हँसते हुए कहा, “हाँ, तेरे पास कई बड़े घर है, वो भी आधे संसार में, लेकिन तूने उन सबको अपने पुस्तैनी मकान की नींव पर बनाया है। होंगे तेरे पास वो सारे घर, लेकिन आज वो तेरा पुराना घर नहीं है जिसमे तू कभी खेलता था। पैदा हुआ, पढ़ा लिखा, बढ़ा हुआ और इस काबिल बना कि उस घर को बेचकर उसे और इस देश को छोड़कर विदेश चला गया। जिसके पास अपने गाँव का घर नहीं, जिसमे उसने दिवाली का पहला दिया जलाया हुआ हो, उसके पास क्या है। वो तो बहुत गरीब हुआ जो कि तू है।”
अमित का चेहरा गुस्से में लाल सा हो गया। फिर हम दोनों के बीच बहुत देर की ख़ामोशी रही।
मैंने कहा, “चाय पियेंगा रे?”
उसने करवट बदलते हुए कहा, “हाँ।”
मैंने उससे पुछा, “मैंने निम्मो को और बच्ची को भी बुलाया था। वो लोग नहीं आये?”
अमित ने कहा, “आये है, हम सब कल देर रात यहाँ पहुंचे है, बिटिया की तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी, मैंने उन दोनों को थोड़ी देर आराम कर के आने को कहा है।”
मैं किचन में गया और केतली में चाय उबालने रखा। मेरे पीछे अमित आ गया था।
मैंने उसे गहरी नजर से देखा, वो भी बुढा हो ही गया था, लेकिन मैं ज्यादा बुढा लगता था। वो थोडा कम लगता था। मुझे चश्मा लग गया था, उसे नहीं, मैं लगभग गंजा हो गया था, वो नहीं, वो अब भी सुन्दर और बेहतर दिखता था, मेरे नजरो के सामने से २५ बरस पहले के बहुत से चित्र गुजर गए।
उसने मुझे देखा और पुछा, “तू क्यों चाय बना रहा है, कोई और नहीं है?”
मैंने एक पल रूककर, भीगे स्वर में कहा, “मैंने शादी नहीं की अमित।”
वो चुप हो गया। मैंने उसकी ओर देखा और उसने मुझे देखा।
२५ बरस पहले के पल हम दोनों के बीच में फिर ठहर से गए थे।
मैंने उससे पुछा, “शक्कर कितनी?”
उसने कहा, “तू बना तो। तेरे हाथ की चाय पीऊंगा। बरसो बीत गए।”
मैंने कहा, “ठीक है, आज तुझे मैं गुड़ की चाय पिलाता हूँ। याद है, हम दोनों कितना पिया करते थे।”

उसने फिर मेरी खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज में हँसते हुए कहा, “लेकिन यार देव, तूने अपने आपको नहीं बदला, अपने माइंडसेट को नहीं बदला, वही का वही रहा। आज भी केतली में चाय! यार मेरे नौकर भी इलेक्ट्रिक स्टोव में कॉफ़ी बनाकर पीते है। मैंने तो बरसो से चाय नहीं पी, मैं तो दुनिया की बेहतरीन कॉफ़ी पीता हूँ। Rwanda Blue Bourbon, Hawaiian Kona Coffee, Hacienda La Esmeralda मैं तो सिर्फ इन ब्रांड्स के काफी को पीता हूँ।”

मैंने उसे टोककर कहा, “फिर भी मेरे घर की चाय पीना चाहता है।”
मैं सर हिलाते हुए हंस पड़ा।
उसने खिसियाने स्वर में कहा, “तो क्या हुआ, दोस्त के घर में उसके पास जो होंगा वही तो पिऊंगा न।”
मैंने सूखे हुए स्वर में कहा, “दोस्त? क्या तू इस शब्द के अर्थ समझता है अमित। नहीं! न तब और न ही अब!”
एक लम्बी खामोशी छा गयी। मैंने चाय उबाली और उसे कप में दिया। वो चुपचाप चाय पीने लगा। मैंने घर की खिडकियों को खोल दिया, ताज़ी हवा भीतर आई। दूर कहीं आरती चल रही थी।
उसने कहा, “संगम के हनुमान मंदिर की आरती है न।”
मैंने कहा, “हाँ !”
बहुत सी यादे हम दोनों के दरमियान फिर तैर गयी।
हम दोनों ने चुपचाप चाय पी।
चाय ख़त्म हुई। मैंने अमित से पुछा, “वो दोनों कब तक आयेंगे?”
अमित ने कहा, “शायद दोपहर तक। तू मिलना चाहता था। हम सबसे। हमें देरी हो गयी आने में। वीसा इत्यादि में समय लग गया। बोल, क्या बात है।”
मैंने कहा, “कोई खास नहीं, बस एक बार तुम सभी को देखना चाहता था।”
एक अजनबी सी चुप्पी हम दोनों के बीच फिर आ गयी।
फिर अमित ने कहा, “तू कितना बुढा हो गया है। तूने उस कॉलेज की नौकरी को छोड़ देना था, ज़िन्दगी भर एक ही जगह रहने में क्या तुक है। तुझे मिला क्या, कुछ भी नहीं। वही छोटी सी नौकरी, वही तन्खवाह। कुछ किताबो में लिख पढ़ कर छप गया। बस और क्या? तू जहाँ था, वही पर खड़ा है देव। क्या खोया और क्या पाया, कभी हिसाब किताब लगाया है तूने ? सिफर! ए बिग जीरो! और कुछ भी नहीं। अबे; मुझे कहता है, पुश्तैनी घर के बारे में, अरे तूने क्या कर लिया, तू तो अपने नाम का एक घर भी नहीं बना सका। पड़ा हुआ है साले अपने पुराने घर में। और मुझे ज्ञान देता है।” इतना कहकर वो हांफने लगा!
मैंने उसकी सारी बाते सुनी। सच्ची बात थी, पर कडवी थी।
मैंने कहा, “व्यापारी तो तू है अमित। हिसाब किताब करना तू जाने। ज़िन्दगी भर तो वही करते आया है न। खरीदना और सिर्फ खरीदना। नहीं?” वो चुप रहा।
उसके चेहरे पर एक रंग आ रहा था और एक रंग जा रहा था।
२५ बरस पुरानी दुश्मनी अब हम दोनों के जुबान में आ गयी थी।
मैंने आगे कहा, “और फिर मुझे किसके लिए घर बनाकर रखना है, मैं तब भी अकेला ही था अब भी अकेला ही हूँ और अकेला ही जाऊँगा। मेरे तो आगे पीछे कोई नहीं; और रही बात मेरे जीरो होने की। तो ठीक है न। जो हूँ, उसमे खुश हूँ। मेरे हिसाब किताब में वो सब कुछ नहीं है, जो तेरी बैलेंस शीट में है। हाँ, एक रिश्ता मैंने बुना था, दोस्ती का तुझसे ! और..............!”
अमित ने हँसते कहा, “और एक रिश्ता बुना मोहब्बत का निर्मल से! जो तेरी न बन सकी। उसने मुझे चुना था देव। वो भी आज से २५ साल पहले। तू तब भी मुझसे हारा था और आज भी तू मुझसे कही पीछे, बहुत ज्यादा पीछे है।”
मैंने कहा, “हां। ये सही है अमित। मैं न दोस्ती जीत सका और न ही मोहब्बत। दोनों रिश्ते मैं हार गया था शायद। पर ज़िन्दगी का हिसाब किताब मुझे तेरी तरह नहीं आता है अमित। देख ले आज तू और निर्मल दोनों ही मेरी यादो में है। जबकि तूने दोबारा मुड़कर नहीं देखा , न ही मुझे और न ही इस शहर को ! हाँ, दोस्ती और मोहब्बत के अलावा भी एक रिश्ता बुना है मैंने। शब्दों से। शब्दों की तासीर से। शब्दों की परछाईयो से। शब्दों की दीवानगी से और शब्दों में धडकती ज़िन्दगी की छाँव से। और अब वही मेरी पहचान है। किताबे मेरी साथी बन गयी है । अमित, मैं अपना अकेलापन शब्दों से भरता हूँ और जीवित रखता हूँ खुद को। लिखना पढना ही अब मेरी पहचान है और वही शायद मेरे संग जायेंगी ! मेरे लिए रिश्ते तेरे व्यापार से कहीं बहुत ज्यादा और बहुत ऊपर है मेरे दोस्त !” अब मैं हांफने लग गया था। मैं थक गया था !
अमित ने मुझे पकड़कर बिठाया। मैं आँखे बंद करके बहुत देर तक अमित का हाथ पकड़कर बैठा रहा। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। एक अजीब सी ख़ुशी मन में आ रही थी। मेरे सबसे अच्छे दोस्त का हाथ था।
हम दोनों बहुत देर तक बैठे रहे। मेरे हाथ में उसका हाथ था और उसके हाथ में मेरा हाथ! हम दोस्त थे। बचपन के। भला उस दोस्ती की महक कैसे चली जाती। मेरी आँखों में बीते दिनों की याद आंसू ले आई। मैंने उठकर उसे अपने गले लगा लिया। बहुत देर तक हम यूँ ही एक दुसरे के गले लगे रहे। फिर मुझे लगा कि मेरा कन्धा उसके आंसुओ से भीग रहा है। मैंने उसे धीरे से अपने से अलग किया, देखा तो उसकी भी आँखे भीगी थी और मेरी भी। हम एक दुसरे को बहुत देर तक देखते रहे। एक पूरा जीवन हमने साथ जिया था। बरसो के पहले के चित्र बंद आँखों के सामने से गुजर गए। एक पूरी ज़िन्दगी आँखों में से गुजर गयी।
मैंने उससे कहा कि वो जाकर निर्मल और बच्ची को ले आये।
उसने हामी में सर हिलाया और जाने लगा ।
मैंने पुछा, “बच्ची का नाम क्या है अमित ।”
वो जाते जाते लौटा और मुस्कराया और मुझसे कहने लगा, “यहाँ मैं तुझसे फिर जीत गया हूँ देव। तूने और निर्मल ने सोचा था कि तुम्हारी संतान होंगी और अगर वो बेटी हुई तो उसका नाम तुम अपेक्षा रखोंगे। जब हमें बेटी हुई तो निर्मल ने मुझसे इस नाम की रिक्वेस्ट की और मैं मान गया। मेरी बेटी का नाम तेरे सपनो की बेटी का है। अपेक्षा!”
मैं अवाक था। मेरी आँखे और भीग गयी, मैं कुछ न कह सका और उसकी ओर देखकर मैंने अपनी बांहे फैला दी। उसने मुझे देखा और बिना मेरी बांहों में आये घर से बाहर चला गया ।
मैं फिर अपने आराम कुर्सी पर बैठ गया। मैं काँप रहा था। ज़िन्दगी भी क्या क्या रूप दिखाती है। मैं एक निशब्द एकांत के साए में चला गया। और बीते हुए समय की परतो में पता नहीं क्या तलाश करने लगा।

२५ बरस पहले..............!

/// एक ///

बरसो पहले हम दोनों की दोस्ती सारे इलाहाबाद शहर में मशहूर थी। एक ही साइकिल पर घूमना, साथ साथ रहना, पढना और खाना पीना तक साथ-साथ । कभी मैं उसके घर रुक जाता, कभी वो मेरे घर रुक जाता। दोनों के घरवालो में सिर्फ पिता ही बचे थे। ज़िन्दगी अपनी गति से भाग रही थी। समय जैसे पलक झपकते ही बदल जाता था। स्कूल से कॉलेज तक का सफ़र और फिर नौकरी लगने तक का सफ़र। सब कुछ साथ साथ ही रहा। रोज सुबह संगम के तट पर भागना और फिर हनुमान जी के मंदिर की आरती में शामिल होना और फिर अपना दिन शुरू करना। ज़िन्दगी बहुत ही खूबसूरत थी । फिर उसके पिता नहीं रहे। वो हमारे संग ही रहने लगा। फिर मेरे पिता भी नहीं रहे। हम फिर भी साथ ही रहे। कभी मैं उसके घर तो कभी वो मेरे घर। हर दिन सिर्फ हमारी दोस्ती को बढाता ही था। मेरी नौकरी लगी एक कॉलेज में शिक्षक की, जो कि मेरे मन की थी। अमित को नौकरी पसंद नहीं थी। वो छोटे मोटे काम करते रहा। फिर उसने मसालों का व्यापार शुरू किया। धीरे धीरे उसने उस व्यापार में अपने पैर जमाने शुरू किया। मैं अपनी नौकरी में खुश और वो अपने व्यापार में खुश। कुछ भी हो जाए हम साथ में रात का खाना जरुर खाते थे।
सब कुछ ठीक ही था जब तक कि, निर्मल से मेरी मुलाकात नहीं हुई।
निर्मल मेरे ही कॉलेज में लेक्चरर बनकर आई और पहले ही दिन मैं उस से प्रेम कर बैठा। मैं हिंदी पढाता था और वो भी हिंदी ही की लेक्चरर थी। बस धीरे धीरे मुलाकाते हुई और प्रगाढ़ता बढ़ी। वो मुझे पसंद करती थी और मैं उसे चाहता था। हम दोनों में कितनी बाते एक जैसी ही थी। ...........हिंदी...कविता...प्रेम....जीवन को मुक्तता से जीना और दोनों का ही शिक्षण के क्षेत्र में होना। सब कुछ कितना अच्छा था। मेरा तो आगे पीछे कोई नहीं था। पर उसके घर में उसके माता –पिता थे। वो एक मिडिल क्लास फॅमिली से थी। और उसके सपने थे। ज़िन्दगी की शुरुवात में जो गरीबी उसने देखी थी, उससे वो बाहर आना चाहती थी। बस इस एक विषय पर हम अलग थे। मैं सपने ज्यादा देखता नहीं था और अगर सोचता भी था तो सिर्फ एक मामूली ज़िन्दगी के बारे में ही सोचता था। गरीबी मैंने भी देखी थी पर मैं बहुत संतोषी था। निर्मल को संतोष नहीं था। उसके सपने बहुत बड़े थे। और मुझे ये बात बुरी नहीं लगती थी। सब मेरी तरह साधू तो नहीं थे न! मैं उसके परिवार से मिला। उन्हें मैं अच्छा लगा और मुझे वो सब। मैंने सोच लिया था कि निर्मल से ही शादी करके घर बसाऊंगा। मैंने निर्मल से शादी की बाते की। उसने हां कह दिया!
मैंने अमित को निर्मल के बारे में बताया। वो भी मिलना चाहता था। पर उन दिनों वो अपने व्यापार के सिलसिले में केरल, गोवा तथा अन्य जगहों पर जाता था और धीरे धीरे एक्सपोर्ट्स के बारे में सोच रहा था।

/// दो ///

दिवाली के दिन थे, जब वो वापस आया। आते ही मुझसे लिपट गया और कहने लगा, “अबे देव, मुझे एक्सपोर्ट का लाइसेंस और परमिशन मिल गया है और बहुत जल्दी ही मैं अपना काम दुसरे देशो में स्टार्ट करूँगा, तू ये नौकरी छोड़ और मेरे साथ आ जा।” मैंने हँसते हुए कहा, “अरे, ये धंधा तुझे ही मुबारक हो, मैं यही ठीक हूँ। हां; तू आगे बढ़, मुझे इससे ज्यादा ख़ुशी क्या होंगी”
उसने हँसते हुए कहा, “तू नहीं बदलेंगा रे। अच्छा ये सब छोड़, मुझे बता तू मुझे निर्मल से कब मिला रहा है।”
मैंने कहा, “आज दिवाली है, शाम को उसके घर चलते है”
हम शाम को तैयार हुए । वो तब भी मुझसे खुबसूरत ही था और अब कुछ नए कपडे भी खरीद लिया था। मेरे लिए भी कपडे लाया था। मैंने उसका लाया हुआ कुरता पहना और उसने कोट पैंट। मैंने कहा, “तू तो यार और अच्छा लग रहा है।” वो हंस दिया। हम दोनों निर्मल के घर चले। उसने कई उपहार खरीद रखे थे निर्मल के लिए, उसने वो सब ले लिए, मैंने कुछ मिठाई खरीदी और हम दोनों रिक्शे में बैठकर उसके घर पहुंचे।
निर्मल इलाहाबाद के मीरगंज इलाके में रहती थी। मैंने अमित को उसका घर दिखाया। घर दियो से सजा हुआ था। मैंने कहा, ”अमित यहाँ से चलकर तेरे घर में भी दिए जलाना है।” अमित ने कहा, ”ठीक है न यार। बस यहाँ से चलते है थोड़ी देर में।”
मैंने निर्मल का दरवाजा खटखटाया। निर्मल ने दरवाजा खोला। वो बहुत सुन्दर लग रही थी। उसने मेरे मनपसंद रंग गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी। अमित उसे देखते ही रह गया। मैंने उन दोनों का परिचय एक दुसरे से कराया। अमित ने धीरे से मुझे कुहनी मार कर कहा, “अबे ये तो बहुत सुन्दर है। तुझ जैसे बन्दर को कहाँ से मिल गयी।” मैंने हंसकर कहा, “अपने अपने नसीब है रे, कभी कभी हम जैसे लंगूर को हूर मिल जाती है” ये सुनकर निर्मल शरमा गयी और हम सब हंस पड़े।
हम सब उसके परिवार से घुल मिल गए। अमित का रंग निर्मल के परिवार पर कुछ ज्यादा ही जमा हुआ था। निर्मल के पिता उससे काफी प्रभावित हुए। मुझे लग रहा था कि निर्मल को मिले हुए सपने उसके पिता के सपनो का ही एक्सटेंशन है। खैर हमने पूजा की और फटाके फोड़े। निर्मल और अमित ने खूब फटाके फोड़े। अमित के लाये हुए उपहार सभी को पसंद आये। हम वापस चल पड़े ।
अमित ने राह में मुझसे कहा, “अबे तेरी तो सच में किस्मत खुल गयी है।” मैं मुस्करा दिया। अमित ने कहा, “यार मुझे भी निर्मल पसंद है; यदि तेरा शादी का मन न बने तो मुझे कह देना, मैं शादी कर लूँगा।” पूरी शाम में बस उसकी यही बात मुझे अच्छी न लगी। मैं चुप रह गया।
हम अमित के घर गए, वहां दिए जलाए, पूजा की और मेरे घर की ओर चल पड़े।
रात में, अमित अपने कुछ नए व्यापारी मित्रो से मिलने चला गया। और मैं अपने घर में दियो की रौशनी में अपने भविष्य के सपनो को बुनता रहा।
फिर मेरा विचलित मन न माना तो मैंने निर्मल को फ़ोन किया। उससे बाते की। मैंने उससे पुछा कि क्या वो मेरे घर आ सकती है। उसने थोडा सोचकर कहा “हां, मैं आती हूँ।”
करीब एक घंटे बाद वो आई। उसी नीली साड़ी में। घर में उसके आते ही जैसे उजाला हो गया। मैंने धीरे से उसका हाथ थामकर उससे कहा, “मेरी हो जाओ निम्मो’। मैं उसे प्यार से निम्मो कहता था।
उसने कहा, “मैं तुम्हारी ही हूँ देव!” मैंने उसे अपनी बांहों में ले लिया. उसने मेरा चेहरा अपने हाथो में ले लिया और मेरे माथे पर एक छुअन के साथ धीमे से कहा, “फिर से दिवाली की ढेर सारी शुभकामनाये।”
हम दोनों बहुत देर तक वैसे ही खड़े रहे। मैंने उसका चेहरा अपने हाथ में लेकर कहा, “निम्मो हम जल्दी से शादी कर लेते है और अपना घर बसा लेते है।”
उसने कहा, “हाँ पर थोडा रुक जाओ, अगले साल शादी कर लेते है, मेरे घर में शादी के इंतजाम के लिए पैसे नहीं है। मैं अकेली लड़की हूँ, माँ बाबू जी के सपने है। थोडा रुक जाओ। सब ठीक हो जायेंगा”
मैं उसे अपने घर की छत पर ले आया, हम बहुत देर तक शहर की रोशनियों को देखते रहे। बहुत अच्छा लग रहा था। मैंने उसका हाथ पकड़ रखा था। मैंने उससे कहा, “निम्मो मैं चाहता हूँ कि हमारी पहली संतान एक बेटी हो उसका नाम अपेक्षा रखेंगे।”
निर्मल ने पुछा, “अपेक्षा क्यों भला !”
मैंने कहा, “क्योंकि वो हम दोनों की अपेक्षा होंगी। इसलिए !”
हम दोनों हंस पड़े। मैंने उसे फिर अपनी बांहों में ले लिया। बहुत देर तक रात ऐसे ही ठहरी रही।
फिर नीचे से अचानक आवाज़ आई, “देव कहाँ है रे ?”
वो अमित की आवाज़ थी।
हम दोनों नीचे चल पड़े। अमित ने हम दोनों को देखा तो चौंक गया और कहने लगा, “अरे निर्मल, तुम यहाँ कब आई? अगर मुझे पता रहता तो मैं बाहर जाता ही नहीं। तुम कितनी खूबसूरत लग रही हो। ये नीली साड़ी तुम पर कितनी अच्छी लग रही है।“
मैंने कहा, “अरे रुक जा भाई तू तो एक दिन में इतनी तारीफ कर रहा है, जितनी मैंने अब तक नहीं की होंगी।“
अमित ने कहा, “अबे, ये मेरा स्टाइल है मैं तेरे जैसा old fashioned नहीं हूँ ।“
निर्मल ने कहा, “अमित बहुत अच्छा दोस्त है न। मुझे तो अमित और उसकी बाते बहुत पसंद है।“ अमित जोर से हंस पड़ा, लेकिन पता नहीं क्यों ; मुझे निर्मल की ये बात अच्छी नहीं लगी ।
हम तीनो बहुत देर तक फिर से छत पर जाकर बैठे रहे, रोशनियाँ देखते रहे। फटाको का शोर सुनते रहे।
मैं तो खैर चुप ही था, वो दोनों बहुत सारी बाते करते रहे।
इतने में निर्मल के पिताजी का फ़ोन आया। उन्होंने उसे वापस भेजने को कहा।
अमित ने कहा कि वो निर्मल को छोड़ आयेंगा। मैं ने उन दोनों को विदा किया।

/// तीन ///

दिन गुजरते रहे। ज़िन्दगी अब कुछ और तेज हो गयी थी।
हम तीनो की जिंदगियां एक साथ होकर भी अब अलग-अलग हो रही थी। मुझे कुछ आभास हो रहा था कि अमित; निर्मल और उसके परिवार में कुछ ज्यादा ही शामिल हो गया था। मुझसे कहीं ज्यादा। स्वभाव तो अमित का अच्छा ही था ऊपर से उसका व्यापार और उसकी महत्वकांक्षाए।
मुझे लगने लगा था कि एक साथ मैं बहुत कुछ, बहुत ज्यादा बाजियां हारने वाला हूँ।
मैं अब निर्मल को बार बार शादी के लिए कहने लगा। वो शादी की बात को टाल जाती थी। मैं ये भी जानता था कि वो और अमित अब कुछ ज्यादा ही मिलने लगे थे।
अमित अब मुझसे ज्यादा बाते न करता था और अक्सर मुझसे आँखे चुराने लगा था। निर्मल भी अब ज्यादातर समय चुप ही रहती थी।
फिर एक दिन अमित ने मुझसे कहा, “देव, मुझे एक्सपोर्ट के सिलसिले में विदेश जाना है, मैं लंदन जा रहा हूँ वहाँ पर अपना पहला ऑफिस खोलना है। तू चल मेरे साथ। मुझे बहुत ख़ुशी होंगी।
मुझे भी ये सुनकर बहुत अच्छा लगा। मैंने कहा, “यार मेरे पास तो पासपोर्ट भी नहीं है। तू जा, मेरी शुभकामनाये तेरे साथ है। ज़िन्दगी में आगे बढ़। तू बहुत सफल होंगा।”
उसने मुझे गले लगा लिया और फिर धीरे से कहा, “क्या मैं निर्मल को अपने साथ ले जा सकता हूँ “
मैं ये सुनकर अवाक रह गया, फिर मैंने धीरे से कहा, “अगर वो जाना चाहती है तो ले जा। लेकिन क्या उसके पास पासपोर्ट और वीसा है ?”
अमित ने बिना मेरी ओर देखे कहा, “हां मैंने बनवा दिया था उसका भी और उसके माँ बाबु का भी।”
मैंने ये सुना तो क्रोध से पागल सा हो गया। मैंने उसका कॉलर पकड़कर कहा, “साले, मेरे बारे में नहीं सोचा, उनका पासपोर्ट और वीसा बनवा लिया. यही तेरी दोस्ती है ? तुझे हो क्या गया है बोल तो।”
उसने बिना मेरी ओर देखे कहा, “देव, मैं भी निर्मल से प्रेम करने लगा हूँ बस !”
मैं ने उससे कहा, “तूने ये क्या कह दिया यार। मैं तेरा दोस्त हूँ। तुझे मेरी दोस्ती का ख्याल नहीं आया।“
उसने मेरी ओर देखते हुए कहा, “देव मैं तुझसे माफ़ी मांगने के काबिल भी नहीं हूँ। पर ये दिल की बात है , मैं ये भी कहना चाहूँगा कि निर्मल तेरे साथ कभी खुश नहीं रह पाती। उसकी अपनी महत्वकांक्षाए है जो कि तू कभी पूरी नहीं कर पाता।”
मेरी आँखों में आंसू आ गए। मैंने कहा, “लेकिन प्रेम; वो तो सबसे ऊपर है।“
अमित ने कहा, “ज़िन्दगी सबसे ऊपर है देव। प्रेम सिर्फ सपनो में जीने की चीज है। तू अपने आपको बदल। चाहता तो मैं था कि तू मेरे साथ ही रह, लेकिन तू नहीं रह पायेंगा।“
मैं क्रोध में पागल हो रहा था, मेरे संवेदनशील मन को यह सब कुछ सहन नहीं हो पा रहा था . मैंने उसे धक्का देते हुए कहा, “निकल जा मेरे घर से अमित, आज के बाद तू मुझे अपनी सूरत मत दिखा। तूने जो धोखा दिया है, उसके लिए ईश्वर भी तुझे माफ़ नहीं करेंगा। तू कभी सुख से नहीं जी पायेंगा।“
अमित ने कहा, “यार बददुआ तो मत दे, मैं एक नयी ज़िन्दगी शुरू कर रहा हूँ। तू मेरा सबसे अच्छा दोस्त है। ठीक है, मैं तेरे प्यार को तुझ से छीन रहा हूँ; लेकिन उससे हमारी दोस्ती तो ख़त्म नहीं हो जाती न !”
मैंने हिकारत से कहा, “तू और दोस्ती।“
गुस्से में मैंने उसके मुंह पर थूक दिया और कहा, “दूर हो जा साले; नहीं तो मैं तेरी जान ले लूँगा।“
उसने मुझे देखा और अपने आंसू जो कि अपमान और दोस्ती के टूटने की वजह से थे, पोंछते हुए मेरे घर से चला गया। हमेशा के लिए.............!
मैं बहुत देर तक रोते हुए बैठा रहा। फिर गुस्से में निर्मल के घर गया। वहां पर अमित पहले से ही था, मैंने निर्मल को पकड़ा और उसे एक थप्पड़ मारा वो चुपचाप खड़ी रही। मुझसे गुस्सा सहन नहीं हो रहा था। निर्मल के बाबू जी मुझे रोकने आये। अमित ने उनका हाथ पकड़कर रोक लिया और कहा, “उसे अपना गुस्सा निकाल लेने दीजिये बाबू जी।“
मैं निर्मल को घर के बाहर लेकर आया और उसे पुछा, “ये तूने क्या किया निम्मो, मेरे प्यार में क्या कमी थी ?”
मैं रोने लगा था ।
निर्मल चुपचाप थी। उसने मेरे आंसू पोंछे और कहा, “देव; ये प्रेम की कमी के बारे में नहीं है, मेरे अपने सपने है, जो प्रेम से बड़े है, और उन सपनो की पूर्ती तुम नहीं कर सकते थे। तुम्हारा mindset उतना, मेरे महत्वकांक्षाओ जितना बड़ा नहीं है हम साथ रहकर भी साथ नहीं जी पाते। प्रेम का बुखार कुछ दिन में ख़तम हो जाता है। ज़िन्दगी की अपनी दौड़ होती है। जीवन की गति, प्रेम को बहुत पीछे छोड़ देती है। मैंने बहुत सोचकर ही फैसला किया है, तुम एक प्रेमिका के रूप में मुझे हमेशा खुश रखते , पर एक पत्नी के रूप में तुम मेरे सपनो को पूरा नहीं कर पाते देव। मैंने बहुत गरीबी देखी हुई है, मुझे अब जीवन के सुख चाहिए ।“
मैंने कहा, “किसी भी कीमत पर निम्मो ?”
उसने धीरे से कहा, “ हाँ देव !”
मैंने कहा, “और मेरा प्यार, उसका क्या ?”
उसने कहा, “प्यार तो हमेशा ही जीवित रहता है देव। हाँ जीवन के रास्ते अलग-अलग हो जाते है। मुझे माफ़ कर दो देव !”
मैंने कहा, “नहीं निम्मो तुम माफ़ी के काबिल नहीं। तुमने और अमित ने मुझे छला है। तुम दोनों को मैं कभी माफ़ नहीं करूँगा”
मैं वापस चला आया।

/// चार /// 

कुछ दिनों के बाद पता चला कि अमित ने अपना और निर्मल का घर बेच दिया है और हमेशा के लिए विदेश जा रहा है।
मुझसे नहीं रहा गया; मैं आखरी बार उन दोनों से मिलने पहुँचा। निर्मल का परिवार और वो दोनों विदेश जाने की तैयारियां कर रहे थे। मैं पहुंचा। मुझे देखकर अमित और निर्मल दोनों ठहर से गए। समय भी ठहर सा गया, मैंने बहुत प्यार और बहुत प्यास से दोनों को देखा। दोनों मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा थे और अब दोनों ही अलग हो रहे थे। शायद हमेशा के लिए ।
मुझे रोना आ गया। अपनी हार पर। अपनी बेबसी पर और जो कुछ मैं खो रहा था उस पर!
वो दोनों मुझे देख रहे थे। चुपचाप। भरी हुई आँखों से। निर्मल और अमित दोनों की आंखे भी बह रही थी। एक दोष का भाव था उनके चेहरे पर और आँखों पर और शायद अंतरात्मा पर भी।
मैंने रोते हुए कहा, “जाओ खुश रहो। मैं अब तुम दोनों से जीवन में कभी नहीं मिलना चाहूँगा !”
निर्मल ने कुछ कहना चाहा पर उसका गला रुंध गया मैं वापस लौट पड़ा।
वो सब चले गए !
/// पांच ///
मेरी ज़िन्दगी में एक अजनबी सा एकांत आ गया था। मुझे कभी कभी आत्महत्या कर लेने का मन हो जाता था। एक बार मैंने संगम में कूदकर जान देने की कोशिश भी की, पर लोगो ने बचा लिया। मुझे शायद जीना था इसी दुःख के साथ। यही मेरी नियति थी।
मैंने जीने के लिए सिगरेट और किताबो का सहारा लिया। किताबे मुझे हमेशा से ही प्रिय थी। धीरे धीरे समय बीतता रहा। मैं कहानी और कविता लिखने लगा। ज़िन्दगी में कोई चाह नहीं रही। सिगरेट के धुएं ने मेरी सारी चाहतो को एक विराम सा दे दिया था ।
कई साल बाद जब मुझे पता चल कि अमित का घर फिर से बिकने वाला है तो मैंने उसे अपने प्रोविडेंट फण्ड के पैसो और अपनी जिंदगी भर की कमाई लगाकर खरीद लिया। पता नहीं मेरे मन में उस वक़्त क्या विचार थे। पर हर दिवाली को मैं अपने और अमित के घर में जाकर दिए जला दिया करता था।
समय बीतता रहा। और फिर कुछ महीनो पहले मुझे पता चला कि मुझे कैंसर हो गया है और अब ज्यादा दिनो की ज़िन्दगी शेष नहीं रही थी। मैंने वकील के साथ मिलकर कुछ कागजात तैयार किये।
वसीयत के कागजात! अपनी सम्पति की वसीयत! अपनी ज़िन्दगी की वसीयत! अपने शब्दों की वसीयत!
और एक दिन मैंने निर्मल और अमित को उनकी बच्ची के साथ अपने घर बुला लिया, ताकि एक आखरी बार उन्हें देख लूं और अपना सब कुछ उन्हें दे सकू!
अचानक मुझे जोरो से खांसी आई और मैं यादो के सफ़र से वापस आज के इस पल में लौट पड़ा!

आज दोपहर..............!

मैंने फ़ोन करके अपने वकील मित्र को बुला लिया और उसे कुछ और कागज़ जल्दी से तैयार करके लाने को कहा।
मैंने सोचा इन सभी को क्या खिलाऊं। फिर मैं मुस्करा उठा। अमित को मेरे हाथो की बनी हुई खिचड़ी बहुत पसंद थी। उन दिनों, पैसो की कमी के कारण मैं दाल, चावल, कुछ सब्जियां सब मिलाकर खिचड़ी बना लेता था। और उसे मैं और अमित, आचार के साथ बड़े चाव से खाते थे। हर जगह हमारी ये “बम्बाट खिचड़ी” मशहूर थी। मैंने ये खिचड़ी निम्मो को भी खिलाया था, उसे भी बहुत पसंद आई थी. उसने कहा था, “शादी के बाद तुम मेरे लिए रोज़ ये खिचड़ी बनाया करना।“
शादी के बाद...........!!!
मैंने बड़े अवसाद में सर हिलाया। मेरी ज़िन्दगी भी क्या सर्कस के जोकर की तरह हो गयी थी। मेरी आँखे भीग गयी।
मैंने खिचड़ी बनायी। घर ठीक किया। कुछ पुराने गानों के कैसेट थे, उन्हें बहुत दिनों से नहीं सुना था। हम तीनो को गुलाम अली के ग़ज़ल बहुत पसंद थे। उनकी गजलो की कैसेट ढूंढ कर प्लेयर पर चला दिया। घर भर में गुलाम अली की आवाज गूंजने लगी। मन को कुछ अच्छा लगने लगा था।
अचानक घर की घंटी बजी, मैंने बड़ी उम्मीद से दरवाजा खोला, ये सोचकर कि निम्मो आई होंगी, पर दरवाजे पर मेरा वकील मित्र था। उसने मुझे कागजात दिए और गले से लगा लिया। जाते जाते वो मुड़ा और मुझे एक सलाम किया। मैं भी मुस्करा उठा!
मैं अपनी आरामकुर्सी पर बैठ गया और यादो में खो गया। शाम होने की थी; अब तक वो लोग नहीं आये थे।
गुलाम अली की नयी ग़ज़ल शुरू हो गयी थी “किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह..............!”
मेरी आँखे भीग गयी। कितना चाहा था मैंने निर्मल को और अमित को भी। पर क्या मिला मुझे! एक नितांत एकांत! पर अब ठीक है। अब ज़िन्दगी बची ही कितनी है।
इतने में दरवाजे पर आहट हुई। मैंने मुड़कर देखा। अमित दरवाजे पर था। मैं उठा। दरवाजे तक गया अपना चश्मा पहना और बाहर की ओर देखा।
अमित के पीछे निर्मल खड़ी थी। मेरी निम्मो! मैंने एक आह सी भरी! जो मेरी हो सकती थी, वो आज किसी और की थी। मेरे दोस्त की! वो आज भी अच्छी लगती थी। मैं ने सबको भीतर आने का इशारा किया और भीतर आने के लिए मुड़ा। अचानक मेरे कदम ठहर से गए। मेरी आँखों में कुछ कौध सा गया था। मैंने फिर मुड़कर दरवाजे के बाहर देखा।
निर्मल के पीछे उसकी बेटी खड़ी थी। नीली साड़ी पहने हुए। निम्मो की दिवाली वाली नीली साड़ी। बेटी को देखा तो आँखों से आंसू बह उठे। मुझे किसी शायर की बात याद आ गयी :
एक पल में जी लिए पूरे बरस पच्चीस हम,
आज बिटिया जब दिखी साड़ी तेरी पहनी हुई !
मैंने उसे अपनी ओर बुलाया। वो हिचकती हुई मेरे पास आकर खड़ी हो गयी। वो पूरी तरह से निम्मो सी ही दिखती थी। हाँ उसका बड़ा माथा अमित पर गया था। अमित के नाक नक्श भी उसे हासिल हो गए थे। मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा। मेरी आँखे बहती रही। फिर मैंने उसका हाथ पकड़ कर भीतर ले आया और अपनी आराम कुर्सी के पास की कुर्सी पर बिठा दिया। और उसे देखने लगा। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैं उठा और घर के भीतर जाकर थोडा सा गुड- चना ले आया। उसे दिया और कहा, “बेटी, खा ले, तू पहली बार अपने घर आई है और इस घर की परंपरा है कि जब कोई पहली बार आता है तो उसे हम गुड-चना खिलाते है।” उसने अपनी माँ की ओर देखा। निम्मो ने सर हिलाकर हामी दी। अमित ने कहा, “खा ले बेटा।” उसने धीरे धीरे खाया।
मैंने उन सभी को बैठने को कहा और खिचड़ी ले आया। सबको परोसा और अपेक्षा को मेरे पास ही बिठाकर उसे खिचड़ी खिलाया। सब चुपचाप खा रहे थे। अपेक्षा को खिचड़ी खाना नहीं हो पा रहा था, उसके लिए ये एक नया भोजन था। मैंने कहा, “बेटा जितना होता है ,उतना खा ले! तेरे माता –पिता को तो ये बहुत पसंद थी। देखो कैसे ठूंस ठूंस कर खा रहे है।” वो हंस पड़ी। मुझे उसकी हंसी बहुत प्यारी लगी। अपनी माँ की तरह हंसती थी! निम्मो की तरह..............!!!!
सबने खाना खा लिया था और अब मेरे करीब ही बैठ गए थे।

आज शाम......!!!

मैं उठा। मैंने अपेक्षा को भी उठने को कहा। मैंने उससे कहा, “चलो बेटी,संध्या हो गयी है, पूजा कर लेते है।“ उसने और मैंने मिलकर सारे घर में अलग- अलग कोनो में दिए लगाए। फिर मैंने कुछ सोचा और फिर घर में जितने भी दिए थे, उन्हें हर ओर लगा दिया। अब लग रहा था कि दिवाली आज ही है। मैं ये सोच ही रहा था कि अमित ने कहा, “आज ही इतने बरसो की दिवाली एक साथ मना ले रहा है रे!”
मुझे बरसो पहले की वो दिवाली की रात याद आ गयी। मैंने कुछ नहीं कहा ।
मैं अपेक्षा का हाथ पकड कर भीतर आया और अपनी आराम कुर्सी पर बैठ गया।
मैंने अमित को देखा वो मुझे ही देख रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि जो गलती उसने उस वक़्त की थी। उसका असर अब मुझ पर इस बुढापे में और भी ज्यादा हो रहा था।
मैंने निर्मल को देखा। मेरी निम्मो! कितना चाहा था मैंने इसे। वो रह-रहकर मुझे देख लेती थी। उसकी नजरो में एक ऐसा गिल्ट फील था जो कि कभी भी उसकी आत्मा से नहीं मिटने वाला था।
मैंने अपेक्षा को देखा। वो मुझे ही देख रही थी। बहुत शांत नज़रो से। उसके आसपास एक पवित्रता सी थी। एक बुद्ध की शान्ति थी। उसने मुझे अपनी ओर देखते हुए देखा तो मुस्करा दी। उसने पहली बार मुझसे कहा, “आप बहुत ग्रेसफुल दिखते है।” मुझे उसकी ये बात बहुत प्यारी लगी !
मैंने सभी को अपने करीब बैठने को कहा और कहने लगा, “मैंने तुम सभी को इसलिए यहाँ बुलाया है, क्योंकि मैं एक बार तुम सभी को जी भर कर देखना चाह रहा था! बहुत बरस बीत गए है तुम्हे देखे हुए। करीब २५ बरस! जीवन इन पच्चीस बरसो में कभी बहुत धीमे तो कभी बहुत तेज गति से गुजरा है।”
मैं थोड़ी देर के लिए रुका और फिर उन तीनो को देखते हुए कहा, “मुझे कैंसर हो गया है, अब ज्यादा दिन नहीं है मेरे पास! इसलिए एक आखरी बार मैं तुम सभी को देखना चाहता था !”
ये सुन कर निर्मल रोने लगी। अमित फटी फटी आँखों से मुझे देखते रहा गया। अपेक्षा की आँखे भीग गयी, उसने मुझसे कहा, “आप हमारे साथ चलिए, हम लन्दन में आपका इलाज करायेंगे !”
ये सुनकर अब मेरी आंखे भीग उठी। मैंने अमित से कहा, “तुझे याद है रे, तूने बरसो पहले साथ चलने को कहा था, आज तेरी बेटी भी वही कह रही है।” अमित ने सर हिलाया। उसकी आँखों से आंसू टपक पड़े।
मैंने आगे कहा, “बीते बरसो में ज़िन्दगी ने मुझे बहुत कुछ सीखाया और मैं तुम दोनों से अपने उस बुरे व्यवहार के लिए माफ़ी मांगता हूँ , जो मैंने तुम्हारे साथ गुस्से में २५ बरस पहले किया था। खासकर मेरे अमित से !”
निर्मल ने कहा, “नहीं देव; तुम क्यों माफ़ी मांग रहे हो। माफ़ी तो हमने मांगी चाहिए थी और सच कहो तो हम माफ़ी के भी काबिल नहीं है। हो सके तो हमें माफ़ कर दो !"
मैंने कहा, “नहीं नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। ज़िन्दगी में तो ये सब होते ही रहता है। मुझे अब किसी से कोई शिकायत नहीं है ! मैं तो अब नौकरी छोड़ चूका हूँ, लेकिन ख़ुशी है कि अमित अब भी काम कर रहा है। भगवान उसे और तरक्की दे। मैं तो यही चाहूँगा कि अमित तू और आगे बढे । तुझे सारी दुनिया की खुशियाँ मिले।”
अमित ने धीरे भीगे स्वर में कहा, “जिस दुनिया में तू नहीं, उस दुनिया की खुशियों का क्या करना है। सच तो यही है कि इतने बरसो में मैंने कभी तुझे फ़ोन नहीं किया। न ही कोई ख़त लिखा। लेकिन मैं अक्सर तेरे बारे में पढ़ता था और मुझे ख़ुशी भी होती थी कि तू इतना अच्छा लिखता है और तेरे जाने की कल्पना मैंने कभी नहीं की।”
मैंने कहा, “हम सभी को एक दिन जाना है अमित। बस अपने कर्म अच्छे रहे यही कोशिश करते रहना चाहिए !”
मैं अब थक गया था। मैं उठा और पानी पिया और घर के भीतर गया। अंदर से तीन लिफ़ाफ़े ले आया।
मैंने अमित को पास में बुलाया उसे एक लिफाफा दिया, मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “घर तेरे पास बहुत होंगे, लेकिन तेरे बचपन का घर नहीं है तेरे पास। तूने उसे बेच जो दिया था, इन नए घरो के लिए! मैं तुझे तेरे बचपन का घर वापस कर रहा हूँ। अबकी दिवाली में वहां दिया जलाना! ये ले उस घर के कागजात,मैंने उसे खरीद लिया था और अब उसे तेरे नाम कर दिया है!” ये कहकर मैंने उसके हाथ में एक लिफाफा रखा!
अमित मुझे देखते ही रह गया। उसका गला रुंध गया, बस उसके आँखों से आंसू बह रहे थे।
मैंने निर्मल को करीब बुलाया। उसे बहुत देर तक देखता रहा। मैंने धीरे से कहा। “निम्मो, मैंने तुझे बहुत बरस पहले अपना सबसे अच्छा दोस्त दे दिया था, उसके बाद मेरे पास तुझे देने के लिए कुछ भी न रहा, लेकिन तुम हमेशा ही मेरी यादो में रही। मैं तुम्हारे नाम से कविताएं लिखता था और अपनी कहानियों में तुम्हारा ज़िक्र करता था। ऐसी ही एक कविता तुम्हे सुनाता हूँ, ये मेरी आखरी कविता है जो मैंने लिखी है :
तुम अपने हाथो की मेहँदी में
मेरा नाम लिखती थी
और मैं अपनी नज्मो में
तुझे पुकारता था ;
ये हमारी मोहब्बत थी
लेकिन मोहब्बत की बाते अक्सर किताबी होती है
जिनके अक्षर वक्त की आग में जल जाते है
किस्मत की दरिया में बह जाते है ;
तेरे हाथो की मेंहदी से मेरा नाम मिट गया,
वो तेरी मोहब्बत थी!
लेकिन मुझे तेरी मोहब्बत की कसम,
मैं अपने नज्मो से तुझे जाने न दूंगा।।।
ये मेरी मोहब्बत है !!

ये सुनाकर मैंने उससे पुछा “कैसी है कविता।“ कोई कुछ न बोला। सब स्तब्ध खड़े थे।
निर्मल मुझे खामोश देख रही थी। उसकी आंखे भरी हुई थी। मैंने उसके हाथ में एक बड़ा सा लिफाफा रखा। मैंने कहा, “निम्मो, मैं अपना सारा लेखन तुझे देता हूँ। मेरी कविताएं, मेरी कहानिया सब कुछ अब तेरा, अब और कुछ मेरे पास तुझे देने के लिए नहीं रहा! तू खुश रहे हमेशा, बस यही एक सच्ची दुआ है मेरे मन में!”
अमित ने मुझे दखते हुए कहा, “आज तू फिर जीत गया देव ! वाकई तू देव ही है। तुझ जैसा कोई और क्या होंगा इस दुनिया में। हम तो किस्मत वाले थे, जो तू हमें मिला, पर हम तेरे देवत्व को, तेरे प्यार को संभाल नहीं सके !”
मैनें कहा, “कहीं कोई हार जीत नहीं है अमित। प्रेम में कोई हारता नहीं है। और न ही कोई जीतता है। न तू जीता और न मैं हारा। मैंने शादी नहीं की पर निर्मल मेरे साथ हमेशा है। ये मेरे प्यार की जीत है। निर्मल ने पूरे २५ बरस तेरे साथ गुजारे, तेरे बच्ची की माँ बनी, कभी तो उसने एक औरत के किसी न किसी रूप में तुझसे प्रेम किया होंगा। ये तेरे उस प्रेम की जीत है, जो तूने निर्मल से किया है। निर्मल ने तुझसे शादी करने के बाद एक बार भी मुझे न कोई ख़त लिखा ना मुझसे मिलने आई, वो पूरी तरह तेरी हो गयी। हाँ, उसने अपनी बेटी का नाम, हमारे सपनो की नींव पर रखा, ये उसके प्रेम की जीत है, जो उसने मुझसे किया है। अब तू बता, जहां हर तरह, हम सब की किसी न किसी तरह जीत है तो हारने का सवाल ही नहीं उठता है। प्रेम सबसे ऊंचा है अमित !”
अमीत और निर्मल की आँखों से आंसू बह रहे थे, अपेक्षा चुपचाप खड़ी थी। मेरी आँखे भीग गयी।
मैंने उसे अपने पास बुलाया, उसके सर पर हाथ रखा और फिर तीसरा लिफाफा उसे दे दिया। मैंने कहा, “बेटी, मेरे पास जो कुछ भी था वो मैंने तेरे माँ बाप को दे दिया है, बस मेरा ये पुरखो का घर है, इसे मैंने तेरे नाम कर दिया है, मेरी इच्छा है कि मेरे मरने के बाद तू कभी कभी यहाँ आकर रहे। मेरे मरने के बाद तू इसमें कभी कभी त्यौहार के दिए जलाना। मेरे कृष्ण की पूजा कर लिया करना। घर के आँगन में एक तुलसी है जिसे मेरी माँ ने बोया था, वो अब भी सदाबहार है, उसमे पानी डाल दिया करना। बस यही मेरी अंतिम ख़ुशी होंगी।”
मैं कांपने लगा था। अमित और निर्मल ने मुझे बिठाया।
पता नहीं दोस्ती, प्यार और ज़िन्दगी का ये कैसा चौराहा था, जिस पर हम चारो के आंसू बह रहे थे।
अपेक्षा मेरे पैरो के पास बैठ गयी। मैंने बहुत प्यार से उसके सर को सहलाया। उसे पूरे दिल से आशीर्वाद दिया।
अपेक्षा ने धीरे से कहा, “आपने हम सभी को बहुत कुछ दिया है। आज मैं आपको कुछ देना चाहती हूँ, क्या मैं आपको अब से हमेशा बड़े पापा जी कह सकती हूँ।”
मेरा गला रुंध गया और आंसू बह निकले। मुझे बिना मांगे बहुत कुछ मिल गया था और अब कुछ नहीं चाहिए था।
मैंने उसे, अमित और निर्मल को एक साथ अपने गले लगा लिया!